सरकार बनाम संवैधानिक संस्थाएं: टकराव की इनसाइड स्टोरी

सरकार बनाम संवैधानिक संस्थाएं: टकराव की इनसाइड स्टोरी

Jantantra Tv Desk

December 5,2018 06:43

 देश में बदलाव की बयार के वादे के साथ साढ़े चार साल पहले एक सरकार आई और अब जबकि सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में है तो देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं से   साथ सरकार के टकराव की खबरें लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं। ऐसे में सवाल ये भी है कि क्या ये विशुद्ध रूप से कामकाज का टकराव है या फिर इसके पीछे की वजह कुछ और है।   साथ ही जिस तरह से इन संस्थाओं के मुखिया अपने कार्यकाल के बाद या कार्यकाल के दौरान ही सरकार की नीतियों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं.. उससे भी यही लगता है कि   सरकार  और इन संवैधानिक संस्थाओं के बीच तारतम्य बैठता दिख नहीं रहा लेकिन हैरानी इस बात की भी है कि आखिर ये सब सरकार के आखिरी महीनों में ही क्यों हो रहा है। कहीं ये   निज़ाम बदलने की आहट और उसकी अकुलाहट तो नहीं ?

 

 सरकार और केन्द्रीय सूचना आयोग के बीच विदेश से आए कालेधन के ब्यौरे को लेकर ताजा उठापटक एक बार फिर इशारा कर रही है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो   बड़ी गड़बड़ है। और तो और सीआईसी ने तो सरकार पर उसे कानूनी दांवपेंचों में फंसाने जैसे गंभीर आरोप तक लगा दिए। सीआईसी के पूर्व सूचना आयुक्त श्रीधर   आचार्यलु ने तो बकायदा राष्ट्रपति तक को चिट्ठी भी लिखी है... आचार्यलु का आरोप है कि केन्द्रीय सूचना आयोग सरकार की तरफ से मुकदमे की धमकी का सामना कर   रहा था। उन्होने इस मामले में राष्ट्रपति से दखल की मांग की। दरअसल  केंद्रीय सूचना आयोग ने 16 अक्टूबर को एक आदेश पारित कर पीएमओ से 15 दिनों के भीतर   काले धन का ब्यौरा मुहैया कराने के लिए कहा था जिसके जवाब में पीएमओ ने सूचना देने से इंकार कर दिया। जाहिर है ऐसे टकरावों से सरकार पर सवाल तो उठेंगे ही।

 

 

 

  ये सिर्फ पहला या इकलौता मामला नहीं है ..हाल ही में अपने रिटायरमेंट के अगले ही दिन पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने नोटबंदी के फैसले पर सवाल उठा दिए औऱ       दावा किया कि नोटबंदी से चुनाव में कालेधन का इस्तेमाल रुकने की बजाय बढ़ गया है और पिछले चुनावों की तुलना में इस बार कहीं ज्यादा कालाधन बरामद मिला..जबकि   नोटबंदी के बाद ये कहा गया था कि चुनाव के दौरान पैसे का दुरुपयोग कम हो जाएगा। जिसे देखकर लगता है कि राजनीतिक दलों और उनके फाइनेंसरों के पास पैसे की कोई   कमी नहीं है।

 

 

 

 पूर्व CIC और पूर्व CEC के ऐसे बयान तो सिर्फ बानगी भर हैं कि सबकुछ ठीक नहीं... इससे पहले सीबीआई और आरबीआई के साथ सरकार के मतभेद और सरकार के फैसलों   पर टकराव के हालात बने...जब दो वरिष्ठ अफसरों के झगड़े में सरकार ने हस्तक्षेप किया तो सीबीआई के डॉयरेक्टर सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। फिर तो   दलीलों और बहस का सिलसिला शुरु हुआ उसमें सरकार की खूब किरकिरी हुई। कुछ ऐसा ही विवाद आरबीआई के साथ दिखा..जब आरबीआई गर्वनर और केन्द्र के बीच   तनातनी सार्वजनिक हो गई...और डिप्टी गर्वनर ने स्वात्तता की मांग उठा दी।

 

 

 आखिर क्यों ऐसे टकराव सामने आ रहे हैं.. क्या सरकारी नीतियां इसकी जिम्मेदार हैं या फिर कहीं नौकरशाही में ये उबाल किसी बदलाव के संकेत के चलते हैं हालांकि सवाल इन   संस्थाओं के उन अधिकारियों पर भी है जो अपने कार्यकाल के दौरान तो चुप्पी साधे रहते हैं लेकिन कार्यकाल खत्म होते ही उनके अंदर का एक्टिविस्ट जाग उठता है । कुछ ऐसे   ही दौर से चार साल पहले पूर्व की मनमोहन सरकार भी गुजरी थी जब मनमोहन सरकार के कई पुराने अधिकारियों ने अपने रिटायरमेंट के बाद या फिर सरकार की सत्ता   से  विदाई के बाद सरकार की नीतियों को कठघरे में ला खड़ा किया । फिर चाहे वो संजय बारू की किताब हो या फिर पूर्व कोयला सचिव पी सी परख की किताब । कुछ ऐसे ही   उदाहरण पूर्व गृह सचिव आर के सिंह, पूर्व सीएजी विनोद राय या फिर ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रहे हरदीप पुरी ने भी रखे जब सरकार जाने के बाद इन्होने उसी सरकार पर   सवाल उठाए जिसमें वो काम कर रहे थे । और अब कुछ ऐसे ही हालात से मोदी सरकार भी गुजर रही है लेकिन सिर्फ इसके चलते ही न सरकार को क्लीनचिट मिल जाती है और   न ही ऐसे अधकारियों के आरोप पूरी तरह से सरकार को कठघरे में खड़ा कर पाते हैं। सवाल तो ये भी है कि सरकार के सहयोगी के तौर पर काम करने वाली ये संस्थाएं वक्त   रहते क्यों मौन रह जाती हैं क्यों उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का ख्याल नहीं आता जब वो वाकई में देशहित में कुछ कर सकती हैं। खैर मौजूदा हालात को देखकर तो वो लाइन याद आ जाती हैं कि राजा बोला रात है फिर मंत्री बोला रात है संतरी भी बोला रात है और ये सुबह सुबह की बात है।

वासिंद  मिश्र (@vasindra_mishra)

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