उत्तर प्रदेश के बांदा की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने न केवल न्याय की जीत की घोषणा की, बल्कि समाज में छिपे ‘नरपिशाचों’ की रूह कंपा दी है। 33 से ज्यादा मासूमों का बचपन उजाड़ने वाले सिंचाई विभाग के निलंबित जेई रामभवन और उसकी साजिशकर्ता पत्नी दुर्गावती को अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई है। जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने कड़े शब्दों में आदेश दिया— “इन दोनों को तब तक फंदे पर लटकाए रखा जाए, जब तक इनकी मृत्यु न हो जाए।”
यह महज एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि इंसानियत के नाम पर एक गहरा कलंक है। चित्रकूट की पहाड़ियों और मंदाकिनी के शांत किनारों के पास जो कुछ हुआ, उसने पूरे देश की रूह कंपा दी। पेश है इस रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले की पूरी रिपोर्ट।
रामभवन जो सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर जैसे जिम्मेदार पद पर तैनात था, अपनी पत्नी दुर्गावती (50) के साथ मिलकर एक खौफनाक ‘सिंडिकेट’ चला रहा था। खुद की कोई संतान न होने का गम पालने के बजाय, इस जोड़े ने दूसरों के चिरागों को बुझाने का धंधा बना लिया था।
चित्रकूट की एसडीएम कॉलोनी में स्थित इनका घर कोई सामान्य निवास नहीं, बल्कि मासूमों के लिए ‘यातना गृह’ था। यहाँ 3 से 16 साल के गरीब बच्चों को मोबाइल गेम, खिलौनों और पैसों का लालच देकर बुलाया जाता था और फिर शुरू होता था दरिंदगी का वो खेल जिसे सुनकर पत्थर दिल भी पसीज जाए।
यह मामला सिर्फ शारीरिक शोषण तक सीमित नहीं था। ये पति-पत्नी तकनीक के भी उतने ही बड़े अपराधी थे। बच्चों के कुकर्म के वीडियो और 679 अश्लील फोटो बनाकर ये दरिंदे चीन, अमेरिका, ब्राजील और अफगानिस्तान जैसे 47 देशों के पेडोफाइल नेटवर्क को बेचते थे।
सीबीआई की जांच में खुलासा हुआ कि रामभवन अंतरराष्ट्रीय पोर्नोग्राफी गिरोह का हिस्सा था। इस मामले का भंडाफोड़ तब हुआ जब इंटरपोल ने इनपुट दिया कि भारत के तीन मोबाइल नंबरों से बच्चों के आपत्तिजनक वीडियो इंटरनेट पर अपलोड किए जा रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पत्नी दुर्गावती महज मूकदर्शक नहीं थी, बल्कि अपराध में बराबर की हिस्सेदार थी। जहाँ पति बच्चों के साथ कुकर्म करता, वहीं पत्नी भी उनके साथ संबंध बनाती और वीडियो रिकॉर्ड करती थी। अगर कोई बच्चा चीखता या विरोध करता, तो उसे बेरहमी से पीटा जाता और उसका मुंह दबा दिया जाता था। बाद में गवाहों को डराने और समझौते के लिए दबाव बनाने में भी दुर्गावती ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
सीबीआई ने गिरफ्तारी के मात्र 88 दिनों के भीतर 700 पन्नों की चार्जशीट दाखिल कर दी थी। वहीं 74 गवाहों की गवाही ने इस केस को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभतम) बना दिया। पीड़ितों की हालत इतनी गंभीर थी कि उनका इलाज दिल्ली के AIIMS में कराना पड़ा।
वहीं पीड़ितों के वकील ने मांग की है कि पीड़ित बच्चों को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए ताकि वे अपने टूटे हुए जीवन को फिर से जोड़ने की कोशिश कर सकें।
यह फैसला उन तमाम सफेदपोश भेड़ियों के लिए एक चेतावनी है जो समाज के बीच रहकर मासूमों को अपना शिकार बनाते हैं।रामभवन और दुर्गावती जैसे लोग समाज पर वो कलंक हैं, जिन्हें मिटाना ही न्याय की असली परिभाषा है। बांदा कोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश बच्चों की सुरक्षा की दिशा में एक पत्थर की लकीर साबित होगा।




















