वक्त का पहिया घूमता है और इतिहास खुद को नए सांचे में ढाल लेता है। दिल्ली की पहचान, यमुना की लहरों का हमसफर और करीब डेढ़ सदी तक उत्तर भारत को पूर्व से जोड़ने वाला ‘लोहे वाला पुल’ (Old Yamuna Bridge) अब अपनी अंतिम पारी खेल चुका है। 1866 से रेल के भारी-भरकम बोझ को अपने कंधों पर ढोने वाला यह ‘बुजुर्ग’ पुल अब आधिकारिक तौर पर रिटायर होने जा रहा है।
वक्त की रफ्तार के आगे अक्सर पुरानी यादें धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन दिल्ली की रगों में दौड़ने वाले ‘लोहे वाले पुल’ (Old Yamuna Bridge) की कहानी कभी नहीं मरेगी। 1866 से आज तक, जिसने कड़कड़ाती ठंड, चिलचिलाती धूप और यमुना के उफान को अपने सीने पर झेला, वो ‘पुराना पुल’ अब हमेशा के लिए थक गया है।
भारतीय रेलवे ने इस ऐतिहासिक पुल को रिटायर करने का फैसला किया है। अब ट्रेनें इसके बगल में बने नए चकाचक पुल पर दौड़ेंगी, लेकिन इस पुराने लोहे के ढांचे के साथ दिल्ली का एक ‘अहसास’ खत्म हो रहा है।
यह सिर्फ ईंट, पत्थर और 3500 टन लोहे का ढांचा नहीं था। यह उस दौर का गवाह था जब दिल्ली और कोलकाता के बीच पहली बार ‘भाप के इंजनों’ ने दौड़ लगाना शुरू किया था।
जब ट्रेन इस पुल पर रेंगती थी, तो खिड़की से यमुना की लहरों को निहारना और पटरी की ‘खट-खट’ आवाज सुनना हर मुसाफिर के बचपन का हिस्सा था। अब दिल्ली से जाने वाली ट्रेनें नए पुल पर शिफ्ट हो गई हैं। पुराने पुल पर ट्रेनों की वो गूंज अब धीरे-धीरे खामोश हो जाएंगी।
यह सिर्फ लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के रेलवे विस्तार की जीती-जागती कहानी है। 1866 में ब्रिटिश इंजीनियर गिल्बर्ट स्कॉट की देखरेख में करीब 3,500 टन रॉट आयरन से इसे तैयार किया गया था। 1867 में जब पहली बार इस पर भाप का इंजन दौड़ा, तो दिल्ली पहली बार सीधे कलकत्ता (कोलकाता) से जुड़ी। व्यापार और डाक सेवा के लिए यह उस दौर का ‘गेम चेंजर’ था। यह डबल-डेकर पुल था जहां ऊपर ट्रेनें गरजती थीं और नीचे पैदल यात्री और गाड़ियां गुजरती थीं।
आधुनिकता की मांग है कि ट्रेनें 100 की रफ्तार से चलें, क्योंकि जर्जर हो चुका यह पुराना पुल अब वो भार नहीं सह सकता। इसीलिए, बगल में बना नया कंक्रीट और स्टील का पुल अब जिम्मेदारी संभालेगा। दिल्ली से जाने वाली ट्रेनें अब नए रास्ते पर हैं, जबकि आने वाली ट्रेनें भी जल्द ही इस पुराने रास्ते को हमेशा के लिए छोड़ देंगी।
रेलवे के गलियारों से एक सुकून भरी खबर आ रही है। इस 159 साल पुराने ‘पुल’ को शायद तोड़ा नहीं जाएगा। इसे एक ‘हेरिटेज साइट’ या म्यूजियम में बदलने की चर्चा है।
मुमकिन है कि कल आप यहाँ अपनी अगली पीढ़ी का हाथ पकड़कर चलें और कहें— “बेटा, इसी पुल ने दिल्ली को पाल-पोसकर बड़ा किया है।
शुक्रिया लोहे वाले पुल! तुम्हारी खड़खड़ाहट हमारे कानों में हमेशा गूंजती रहेगी।















