भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को ट्रंप प्रशासन के आक्रामक टैरिफ नीतियों का एक रणनीतिक जवाब माना जा रहा है। जनवरी 2026 में, ट्रंप ने भारत पर कुल 50% तक टैरिफ लगा दिए हैं (शुरुआत में 25% रेसिप्रोकल, फिर अतिरिक्त पेनल्टी), खासकर रूसी क्रूड ऑयल खरीद और अन्य मुद्दों पर। इसी तरह, यूरोप पर भी 10-30% टैरिफ की धमकी दी गई है, जिससे वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता बढ़ गई है।
इस संदर्भ में भारत-EU FTA को “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। 23 जनवरी 2026 को ट्रेड टॉक्स के निष्कर्ष की संभावना जताई गई, जो टेक्सटाइल्स, गारमेंट्स, फार्मास्यूटिकल्स, स्टील, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे भारतीय निर्यात पर टैरिफ कम करेगा। EU के लिए यह कारों, वाइन, मशीनरी और केमिकल्स में बाजार खोलेगा। विशेषज्ञों (जैसे S&P Global और The Diplomat) के अनुसार, यह डील अमेरिकी बाजार में टैरिफ से होने वाले नुकसान को आंशिक रूप से कम करेगी और भारत को US-निर्भरता से मुक्ति दिलाएगी। साथ ही, यह चीन और रूस पर निर्भरता घटाकर सप्लाई चेन को मजबूत बनाएगा।
EU के लिए यह ट्रेड लिबरलाइजेशन की प्रतिबद्धता दिखाता है, जबकि भारत के लिए यह UK और EFTA के बाद एक बड़ा कदम है। ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति से वैश्विक व्यापार रीवायर हो रहा है, और भारत-EU समझौता दोनों पक्षों को नए बाजार और जोखिम डाइवर्सिफिकेशन देगा। हालांकि, EU संसद की मंजूरी और रूसी ऑयल खरीद में कमी जैसे मुद्दे बाकी हैं। कुल मिलाकर, यह डील ट्रंप टैरिफ के “बाइट” का जवाब है, जो बहुपक्षीय व्यापार को मजबूत करने की कोशिश है।





























