कभी जिस पश्चिम बंगाल की सड़कों पर लाल झंडा शान से लहराता था, जहाँ “लाल सलाम” सिर्फ नारा नहीं बल्कि सत्ता की पहचान था। आज वहीं लेफ्ट फ्रंट का जहाज़ गहरे सियासी भंवर में डूब चुका है। सवाल सिर्फ हार का नहीं, सवाल उस आवाज़ के गुम हो जाने का है जो कभी मज़दूरों, किसानों और वंचितों की सबसे बुलंद आवाज़ हुआ करती थी।
कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग—वह ऐतिहासिक सत्ता-केंद्र, जहाँ से दशकों तक लाल हुकूमत ने बंगाल को दिशा दी। यहीं से ज्योति बसु ने प्रशासन को स्थिरता दी, यहीं से बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगिकीकरण का सपना देखा, और यहीं से वामपंथ ने खुद को एक वैकल्पिक राजनीति के रूप में स्थापित किया। लेकिन यही सत्ता-केंद्र समय के साथ जनता से दूरी का प्रतीक भी बनता गया।
एक तरफ जहां ज्योति बसु लेफ्ट फ्रंट का वह चेहरा थे, जिन्होंने 23 साल तक मुख्यमंत्री रहते हुए शासन को निरंतरता दी। भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था और प्रशासनिक अनुशासन—ये उनकी विरासत थी। मगर केंद्र की सत्ता से दूरी और राष्ट्रीय राजनीति में सीमित हस्तक्षेप ने धीरे-धीरे लेफ्ट को बंगाल तक सिमटा दिया।
वहीं बुद्धदेव भट्टाचार्य ने वाम राजनीति को आधुनिक बनाने की कोशिश की। उद्योग लाने की पहल—सिंगूर और नंदीग्राम—लेफ्ट के लिए निर्णायक मोड़ बन गई। जिस पार्टी की पहचान किसानों-मज़दूरों से थी, वही पार्टी भूमि अधिग्रहण के सवाल पर कटघरे में खड़ी हो गई। और यहीं से लाल सलाम की विश्वसनीयता को गहरी चोट लगी।
पश्चिम बंगाल में विमान बोस जैसे नेताओं ने संगठन को संभालने की कोशिश की, लेकिन ज़मीनी कैडर कमजोर पड़ता गया। पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव नहीं हो पाया। नई राजनीति, सोशल इंजीनियरिंग और आक्रामक जनसंपर्क के दौर में सीपीएम पुराने ढर्रे पर अटकी रही।
जैसे जैसे वक्त गुजरा प्रदेश की राजनीति बदलने लगी। ममता बनर्जी ने लेफ्ट के सबसे मजबूत किले—जनआंदोलन—को ही हथियार बना लिया। उन्होंने सड़कों की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया। परिणाम यह हुआ कि लेफ्ट फ्रंट सत्ता से ही नहीं, विपक्ष की भूमिका से भी बाहर होता चला गया।
आज बंगाल के चुनावी रण में सीपीएम अपने ही अतीत से जूझ रही है। पुराने नेता संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन संगठन में नई ऊर्जा का अभाव साफ दिखता है। लाल झंडा अब भी है, नारे भी हैं—पर वह गूंज नहीं, जो कभी फैक्ट्रियों और खेतों से उठती थी।
लेफ्ट फ्रंट का जहाज़ किसी एक चुनाव में नहीं डूबा। यह वर्षों की नीतिगत भूलों, जनसंवाद की कमी और बदलते समय को न समझ पाने का नतीजा है। सवाल यह है—क्या लाल सलाम खुद को नए दौर में ढाल पाएगा, या बंगाल की राजनीति में वह सिर्फ इतिहास की किताबों तक सिमट कर रह जाएगा?






























