आज, 23 जनवरी को पूरे देश में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पराक्रम दिवस के रूप में अपार उत्साह और भव्यता के साथ मनाई जा रही है। इस वर्ष यह आयोजन खास तौर पर यादगार है, क्योंकि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने नेताजी के जीवन से जुड़े 13 ऐतिहासिक स्थलों का चयन किया है, जहां विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें झारखंड के गोमो (अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन) और रामगढ़ प्रमुख हैं।
गोमो सिर्फ एक रेलवे स्टेशन नहीं, बल्कि नेताजी के अदम्य साहस और महान भागने (ग्रेट एस्केप) का जीवंत साक्षी है। 17-18 जनवरी 1941 की ठंडी रात में, आधी रात के बाद नेताजी ने यहां से ब्रिटिश हुकूमत को चकमा देकर अपनी निर्भीक यात्रा शुरू की थी। यह भारत की धरती पर नेताजी को आखिरी बार देखे जाने का स्थान माना जाता है, जहां से वे कालका मेल (अब नेताजी एक्सप्रेस) पकड़कर पेशावर की ओर रवाना हुए थे। इसके बाद वे रंगून पहुंचे और फिर इतिहास की गहराइयों में गुमनाम हो गए।यह पूरी योजना अत्यंत गुप्त रखी गई थी।
नेताजी अपने भतीजे डॉ. शिशिर कुमार बोस के साथ ऑस्ट्रेलियन वांडरर कार (नंबर BLA-7169) में कलकत्ता से निकले, तोपचांची होते हुए गोमो पहुंचे। यहां उन्होंने हटियाटाड़ के घने जंगलों में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ गुप्त बैठक की। बताया जाता है कि उस रात वे गोमो के लोको बाजार क्षेत्र में कबीलेवालों की बस्ती में छिपकर रहे, ताकि ब्रिटिश जासूस उन्हें न पहचान सकें।
वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) गोमो और रामगढ़ में विशेष कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। ASI के सहायक पुरातत्वविद नीरज मिश्रा के अनुसार, इन स्थलों पर सांस्कृतिक, शैक्षणिक और जागरूकता गतिविधियों के माध्यम से नई पीढ़ी को नेताजी के संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति से परिचित कराया जाएगा।यह पराक्रम दिवस न केवल नेताजी की वीरता को याद करता है, बल्कि युवाओं को उनके आदर्शों से प्रेरित भी करता है।



































