कहते हैं कि किस्मत की लकीरें हाथों में नहीं, माथे के पसीने में होती हैं। इस बात को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की गायत्री वर्मा ने सच कर दिखाया है। एक ऐसी बेटी, जिसके पिता की उंगलियां दिन भर टायर और ग्रीस के बीच पंक्चर जोड़ती रहीं, आज उसी बेटी ने अपनी मेहनत से किस्मत के पेंसिलों को नया मोड़ दे दिया है। गायत्री ने UPPSC (PCS) परीक्षा में 210वीं रैंक हासिल कर यह साबित कर दिया कि महल सफलता की गारंटी नहीं और झोपड़ी मेहनत की मोहताज नहीं।
बुलंदशहर के शिकारपुर रोड पर एक छोटी सी गुमटी है, जहां गायत्री के पिता राजकुमार वर्मा चाय बेचते हैं और टायर पंक्चर बनाते हैं। दिन की 200-400 रुपये की कमाई में घर चलाना मुश्किल था, लेकिन बेटी का सपना राजकुमार के लिए सबसे बड़ा था। राजकुमार वर्मा का कहना है कि कई बार फीस भरने के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाने पड़े, ब्याज पर पैसे लिए, लेकिन मैंने गायत्री को कभी अपनी फटी जेब नहीं दिखाई।
गायत्री की यह उड़ान सीधी नहीं थी। पहले प्रयास में प्रीलिम्स भी नहीं निकला, दूसरे में इंटरव्यू तक पहुँचकर सपना टूट गया। लेकिन गायत्री ने हार मानने के बजाय अपनी कमियों को ताकत बनाया। बिना किसी महंगी कोचिंग के, एक छोटे से कमरे में इंटरनेट और किताबों को अपना हमसफर बनाया और तीसरे प्रयास में सीधे अधिकारी की कुर्सी तक का सफर तय कर लिया।
बेटी के अफसर बनने के बाद जब लोगों ने पूछा कि क्या अब पंक्चर की दुकान बंद होगी? तो राजकुमार का जवाब समाज के लिए एक मिसाल बन गया। उन्होंने कहा, यह दुकान मेरी पहचान है। मेरी बेटी अपना फर्ज निभाएगी, मैं अपना। अभी दो और बच्चों को काबिल बनाना है, और इसी मेहनत की कमाई से उनके सपने भी पूरे होंगे।
आज के दौर में जहां युवा रील और सोशल मीडिया में खोए हैं, गायत्री ने अपनी तैयारी के दौरान फोन का इस्तेमाल सिर्फ पढ़ाई के लिए किया। उन्होंने ऑनलाइन रिसोर्सेज का सहारा लेकर अलीगढ़ में अपने ननिहाल रहकर घंटों पढ़ाई की। आज उनकी सफलता ने पूरे जिले को गौरवान्वित कर दिया है।
गायत्री वर्मा की कहानी उन हजारों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है, जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। गायत्री ने दिखा दिया कि अगर हौसलों में जान हो, तो आसमान छूना नामुमकिन नहीं है।















