बंगाल की राजनीति अगर समझनी है तो विधान भवन नहीं, मोहल्लों के क्लब देखने होंगे। क्योंकि यहां सत्ता का रास्ता वोटर से पहले क्लब से होकर गुजरता है। जिस पार्टी का क्लब पर कब्ज़ा, वही पार्टी मैदान में मजबूत—बाकी सिर्फ बयानबाज़ी करते रह जाते हैं।
बंगाल का हर लोकल क्लब एक मिनी पॉलिटिकल हेडक्वार्टर है। यहीं से तय होता है— किसे प्रचार करना है, किसे डराना है, किसे बाहर रखना है। चुनाव आते ही ये क्लब पोस्टर नहीं, पावर छापते हैं। राजनीतिक दल जानते हैं कि बेरोज़गारी से जूझ रहे युवाओं को अगर बांधना है तो खेल, पूजा, चंदा और थोड़ी सी सत्ता की छाया काफी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यही क्लब कैडर भर्ती का केंद्र बन जाते है, जहां विचारधारा नहीं, वफादारी की शपथ ली जाती है।
आईये आपको बताते हैं कि राजनीतिक पार्टियां क्लबों पर इतना ज़ोर क्यों देती हैं? कोलकाता समेत पूरे बंगाल में ग्राउंड लेवल कैडर तैयार करने की एक फैक्ट्री होती है जो युवाओं को जोड़ने का सबसे आसान मंच हैं। चुनावी मैनेजमेंट का सबसे कारगर नेटवर्क चुनाव के वक्त क्लब ही बनते हैं— बूथ मैनेजमेंट सेंटर, वोटर लिस्ट संभालने का अड्डा, विपक्ष पर नजर रखने का ठिकाना।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी से लेकर लेफ्ट और बीजेपी तक क्लबों से कैडर खड़ा किया। लेकिन तृणमूल ने क्लबों को सत्ता का औजार बनाया और बीजेपी अब उसी मॉडल को कॉपी करने में जुटी है। कुल मिलाकर बंगाल में क्लब सिर्फ खेल या पूजा का मंच नहीं सत्ता का लोकल हेडक्वार्टर हैं। यही कारण है कि बंगाल की राजनीति विधानसभा से ज़्यादा क्लबों में लड़ी जाती है।





































