भाजपा की रणनीति पर नजर डाले तो अमित शाह और अन्य नेता बार-बार कह रहे हैं कि 2026 में “टीएमसी को अलविदा”। वे मारवाड़ी समाज को “हिंदू एकता” और “आर्थिक राष्ट्रवाद” के नाम पर जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली-अहमदाबाद-जयपुर के बड़े मारवाड़ी घरानों से बाजपा का संपर्क बढ़ा है। कुछ सीटों पर मारवाड़ी चेहरों को टिकट देने की चर्चा भी जोरो पर है।
वहीं टीएमसी के प्लान ऑफ एक्शन पर गौर करे तों ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी “बंगाल की अस्मिता” को आगे रखकर कह रहे हैं कि भाजपा “बाहरी” है। उन्होंने मारवाड़ी व्यापारियों को कई बार सम्मानित किया, लोकल समस्याओं में मदद की। TMC का दावा है कि— “मारवाड़ी बंगाल के ही हैं, वे दीदी को नहीं छोड़ेंगे।”
लेकिन अब असली खेला कोलकाता की इन सीटों पर होनेवाला है।अगर मारवाड़ी समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ़ मुड़ता है तो भवानीपुर, जोड़ासांको, श्यामपुकुर, रास बिहारी जैसी सीटें TMC से छिटक सकती हैं। कोलकाता की 11-12 सीटों में से 4-6 सीटें बदल सकती हैं और TMC का कोलकाता गढ़ कमजोर होगा। अगर ऐसा हुआ तो ममता की कुल सीटें 200 के नीचे आ सकती हैं। जो सत्ता पर बड़ा खतरा बन सकता है।
अगर मारवाड़ी समाज टीएमसी के साथ टिका रहता है तो कोलकाता में TMC फिर से लगभग क्लीन स्वीप कर सकती है। ममता की सत्ता न सिर्फ बचेगी, बल्कि और मजबूत होगी—क्योंकि कोलकाता का “बिजनेस वोट” उनके साथ रहेगा, और ग्रामीण-शहरी संतुलन बना रहेगा।
बड़ाबाजार की चाय की दुकानों पर सवाल वही है। “इस बार सौदा किसके साथ? विकास के नाम पर कमल, या सुरक्षा-स्थिरता के नाम पर दीदी?” चुनावी स्टोरी का क्लाइमेक्स मार्च-अप्रैल 2026 में होगा—जब वोट डाले जाएंगे। तब तक कोलकाता की गलियां और मारवाड़ी समाज का मन क्या कहता है, यही तय करेगा कि बंगाल में अगले 5 साल कौन चलेगा।









































