भारत में जब भी पुरानी मस्जिदों का जिक्र आता है, तो अक्सर जेहन में मुगलों या विदेशी आक्रमणकारियों की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की सबसे पहली मस्जिद किसी युद्ध का नतीजा नहीं, बल्कि एक हिंदू राजा के विश्वास और सांप्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल है?
केरल के कोडुंगल्लूर में स्थित ‘चेरामन जुमा मस्जिद’ भारत के उस गौरवशाली इतिहास की गवाह है, जहाँ तलवार के दम पर नहीं बल्कि आपसी संवाद और व्यापारिक रिश्तों के जरिए एक नए धर्म ने अपनी जगह बनाई।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो राजा चेरामन पेरुमल की कहानी सबसे प्रमुखता से उभरती है। कहा जाता है कि तत्कालीन केरल के शासक पेरुमल ने एक रात सपने में चंद्रमा को दो टुकड़ों में टूटते देखा था। जब अरब से आए व्यापारियों ने उन्हें इसका धार्मिक अर्थ समझाया, तो वे इससे बेहद प्रभावित हुए।
राजा ने न केवल इस्लाम स्वीकार किया और अपना नाम ताजुद्दीन रखा, बल्कि मक्का जाने का निर्णय भी लिया। लेकिन जाने से पहले उन्होंने भारत में इस्लाम की पहली नींव रखने का आदेश दिया। इसी के परिणामस्वरूप 629 ईस्वी (AD) में चेरामन जुमा मस्जिद का निर्माण हुआ।
इस मस्जिद की सबसे खास बात इसकी बनावट है। 7वीं सदी में बनी यह मस्जिद पारंपरिक केरल शैली में बनाई गई थी, जो पहली नजर में किसी मंदिर या पुराने महल जैसी प्रतीत होती है। इस मस्जिद में एक प्राचीन तेल का दीपक (चिराग) आज भी मौजूद है, जो माना जाता है कि 1000 साल से भी अधिक समय से जल रहा है। इस चिराग के लिए तेल का दान हर धर्म के लोग श्रद्धा के साथ करते हैं, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक है।
राजा चेरामन पेरुमल के मक्का जाने के बाद, उनके द्वारा लिखे गए पत्रों को लेकर मलिक दीनार और उनका परिवार भारत आया। राजा के आदेश का सम्मान करते हुए स्थानीय सरदारों ने उनकी मदद की, जिससे केरल के तटीय इलाकों में शांतिपूर्ण तरीके से इस्लाम का विस्तार हुआ। चेरामन जुमा मस्जिद के बाद 7वीं सदी में ही कई अन्य महत्वपूर्ण मस्जिदें बनीं।
जहाँ भारत की पहली मस्जिद 629 ईस्वी में बनी, वहीं दुनिया की सबसे पहली मस्जिद सऊदी अरब के मदीना में स्थित ‘कुबा मस्जिद (Quba Mosque)’ है। इसका निर्माण 622 ईस्वी में पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना प्रवास (हिजरत) के दौरान किया था। उन्होंने स्वयं इस मस्जिद की पहली ईंट रखी थी।
चेरामन जुमा मस्जिद आज भी कोडुंगल्लूर में शान से खड़ी है। यह न केवल एक इबादतगाह है, बल्कि उन लोगों के लिए एक जवाब भी है जो मानते हैं कि भारत में इस्लाम का आगमन केवल संघर्षों के जरिए हुआ। यह मस्जिद प्रमाण है कि भारत और अरब के बीच प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध कितने गहरे और सम्मानजनक थे।
















