साल 2013, पश्चिम बंगाल की राजनीति में वह भूचाल आया, जिसकी गूंज आज भी चुनावी सभाओं से लेकर अदालतों तक सुनाई देती है। नाम था — शारदा चिट फंड घोटाला। यह सिर्फ एक वित्तीय घोटाला नहीं था, बल्कि सत्ता, सिस्टम और भरोसे की उस साजिश का खुलासा था, जिसने हजारों गरीब परिवारों की ज़िंदगी तबाह कर दी। आज आपको बताएंगे क्या था शारदा घोटाला?
शारदा ग्रुप ने निवेशकों को कम समय में ज्यादा मुनाफे का लालच दिया। ग्रामीण और अर्ध-शहरी बंगाल में एजेंटों का जाल बिछाया गया। महिलाएं, किसान, छोटे कर्मचारी — अपनी जीवन भर की जमा पूंजी लेकर शारदा की योजनाओं में कूद पड़े। असल में यह एक पोंजी स्कीम थी — पुराने निवेशकों को नए निवेशकों के पैसे से भुगतान किया जा रहा था। जैसे ही पैसा आना बंद हुआ, शारदा का साम्राज्य ढह गया।
शारदा ग्रुप का चेयरमैन सुदीप्तो सेन इस घोटाले का चेहरा बना। एक समय मीडिया और सत्ता के करीब दिखने वाला सेन, अचानक फरार हुआ। उसकी गिरफ्तारी के साथ ही ऐसे दस्तावेज सामने आए, जिन्होंने राजनीतिक संरक्षण के आरोपों को हवा दी। सुदीप्तो सेन ने खुद दावा किया कि बिना राजनीतिक ‘आशीर्वाद’ के शारदा जैसा साम्राज्य खड़ा होना संभव नहीं था।
सत्ता की परछाईं और TMC पर आरोप लगे और जांच एजेंसियों की पड़ताल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़े कई नाम सामने आए।
विधायक, मंत्री, सांसद — कई नेताओं को जेल जाना पड़ा, कई लंबे समय तक जांच के दायरे में रहे।
विपक्ष का आरोप था कि— शारदा को सरकारी संरक्षण मिला। चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया। साथ ही गरीब निवेशकों की शिकायतें दबाई गईं। वर्तमान TMC सरकार ने हमेशा इन आरोपों से इनकार किया और इसे राजनीतिक साजिश बताया।
एक तरफ जहां इस घोटाले ने ममता बनर्जी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई। वहीं शारदा घोटाले ने ममता बनर्जी सरकार की “ईमानदार राजनीति” की छवि पर गंभीर सवाल खड़े किए। राज्य सरकार ने राहत पैकेज और जांच आयोग की घोषणा जरूर की, लेकिन विपक्ष ने इसे डैमेज कंट्रोल करार दिया।
आज भी हजारों पीड़ित अपने पैसे की वापसी का इंतजार कर रहे हैं। चुनावी राजनीति में शारदा क्यों जिंदा है? हर चुनाव में शारदा घोटाला फिर चर्चा में आता है। बीजेपी इसे TMC के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनाती है, तो वाम और कांग्रेस इसे सत्ता की नैतिक विफलता बताते हैं।
शारदा अब सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि— राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक। गरीबों के टूटे भरोसे की कहानी और सत्ता बनाम जनता की लड़ाई का मुद्दा बन चुका है। सुदीप्तो सेन सलाखों के पीछे है। कुछ नेता जेल गए। कुछ नेताओं के राजनीतिक करियर खत्म हुए।
लेकिन सवाल आज भी वही है— क्या शारदा घोटाले की पूरी सच्चाई सामने आई? क्या राजनीतिक संरक्षण देने वालों पर कभी अंतिम फैसला होगा? चुनाव के इस माहौल में, बंगाल की जनता यही पूछ रही है— शारदा सिर्फ एक स्कैम था या सत्ता की सुनियोजित लूट?










































