हरियाणा सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए राज्य के सभी विभागों, सार्वजनिक संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं और अन्य अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किया है कि वे अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के संदर्भ में ‘हरिजन’ और ‘गिरिजन’ शब्दों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दें। यह आदेश 13 जनवरी 2026 को जारी किया गया, जिसमें मुख्य सचिव कार्यालय ने स्पष्ट किया कि इन शब्दों का प्रयोग अब किसी भी आधिकारिक पत्राचार, रिकॉर्ड, प्रमाणपत्र या संचार में नहीं किया जाएगा।सरकार ने केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इन शब्दों का कोई उल्लेख नहीं है। ‘हरिजन’ शब्द महात्मा गांधी द्वारा इस्तेमाल किया गया था, जिसका अर्थ ‘हरि का जन’ (भगवान का जन) था, लेकिन समय के साथ इसे अपमानजनक और पुराना माना जाने लगा। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और दलित संगठनों ने इसे अस्वीकार किया, क्योंकि यह समुदाय को दया या अलगाव की भावना से जोड़ता है। इसी तरह ‘गिरिजन’ (पहाड़ों के लोग) भी अब अनुपयुक्त माना जाता है।
हरियाणा सरकार ने समीक्षा के दौरान पाया कि कुछ विभाग पहले जारी निर्देशों का पालन नहीं कर रहे थे, जिसके कारण शिकायतें आईं। अब सभी प्रशासनिक सचिवों, विभागाध्यक्षों, बोर्ड-निगमों, डिवीजनल कमिश्नरों, डिप्टी कमिश्नरों, एसडीएम और विश्वविद्यालय रजिस्ट्रारों को निर्देश दिए गए हैं कि वे केंद्र के दिशा-निर्देशों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करें। आधिकारिक भाषा में केवल ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ का ही प्रयोग होगा।
यह फैसला संवैधानिक मूल्यों और सम्मानजनक भाषा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर, कई राज्य और केंद्र पहले ही ऐसे शब्दों पर रोक लगा चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘हरिजन’ जैसे शब्दों को अपमानजनक मानते हुए टिप्पणियां की हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सामाजिक समानता को बढ़ावा देगा और दलित-आदिवासी समुदायों के प्रति सम्मान बढ़ाएगा। हरियाणा में यह बदलाव न केवल सरकारी दस्तावेजों में, बल्कि जन जागरूकता और शिक्षा में भी प्रभाव डालेगा। सरकार ने सभी विभागों से अनुपालन रिपोर्ट मांगी है, ताकि कोई चूक न रहे। यह निर्णय समाज में भाषा की शक्ति को समझते हुए लिया गया है, जहां शब्द व्यक्ति की गरिमा को प्रभावित करते हैं।








