झारखंड के चाईबासा स्थित सारंडा जंगल में गुरुवार को सुरक्षाबलों और भाकपा (माओवादी) नक्सलियों के बीच हुई भीषण मुठभेड़ में एक बड़ा सफल ऑपरेशन हुआ है। इस मुठभेड़ में भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी के सदस्य और 1 करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष नेता पतिराम मांझी उर्फ अनल दा समेत कम से कम 15 नक्सली मारे गए हैं। यह झारखंड में नक्सल विरोधी अभियान की अब तक की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानी जा रही है, जिससे कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में लाल आतंक के किले को गहरा नुकसान पहुंचा है।
पश्चिमी सिंहभूम जिले के किरीबुरु थाना क्षेत्र के कुमडी (कुमडीहा) इलाके में सुबह करीब 6 बजे से शुरू हुई यह मुठभेड़ घंटों तक चली। कोबरा 209 बटालियन, सीआरपीएफ और झारखंड पुलिस की संयुक्त टीम ने खुफिया सूचना के आधार पर सर्च ऑपरेशन चलाया था। नक्सलियों ने घात लगाकर फायरिंग की, जिसके जवाब में सुरक्षाबलों ने भीषण कार्रवाई की। मुठभेड़ के बाद इलाके में भारी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद और अन्य सामग्री बरामद की गई है। सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है ताकि किसी अन्य नक्सली की मौजूदगी को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
मारे गए नक्सली नेता का असली नाम पतिराम मांझी (या पतिराम मरांडी) था, लेकिन संगठन में वह अनल दा, तूफान, रमेश, गोपाल दा जैसे कई नामों से जाना जाता था। वह गिरिडीह जिले के पीरटांड़ थाना क्षेत्र के झरहाबाले गांव का निवासी था। करीब 1987 से नक्सली गतिविधियों में सक्रिय अनल दा को माओवादी संगठन का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था। हमलों की योजना, स्थान चयन और रणनीति तैयार करने में उसकी अहम भूमिका रही। इसी वजह से वह लंबे समय से सुरक्षाबलों की हिट लिस्ट में शीर्ष पर था।
आपको बता दें कि 1987-2000 तक पीरटांड़, टुंडी और तोपचांद क्षेत्रों में गोपाल दा के नाम से सक्रिय होकर नक्सल नेटवर्क का विस्तार किया। उस दौर में इन इलाकों में नक्सलवाद चरम पर था और स्थानीय पुलिस व ग्रामीण दोनों उससे खौफ खाते थे। वहीं साल 2000 के आसपास संगठन ने उसे बिहार के जमुई भेजा, जहां वह एक बार गिरफ्तार हुआ। बाद में गिरिडीह जेल से जमानत पर बाहर आया और गतिविधियां फिर शुरू कीं। जेल से रिहाई के बाद रांची और गुमला जिलों की कमान संभाली, जहां उसने संगठन को मजबूत किया। अपनी रणनीतिक समझ और संगठन क्षमता के कारण भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी में शामिल किया गया।
झारखंड में नक्सली हिंसा, हमलों और विस्तार के पीछे अनल दा की बड़ी भूमिका बताई जाती है। उस पर हत्या, विस्फोट और अन्य गंभीर मामलों में दर्जन भर से ज्यादा केस थे। जानकारों का मानना है कि अनल दा की मौत से माओवादी संगठन को गहरा झटका लगा है। सारंडा को नक्सलियों का अंतिम गढ़ माना जाता था, और इस ऑपरेशन से वहां उनकी पकड़ कमजोर हुई है। इससे झारखंड में नक्सल गतिविधियों पर अंकुश लगने की उम्मीद बढ़ गई है। सुरक्षाबलों का मनोबल भी मजबूत हुआ है। राज्य और केंद्र सरकार ने इस सफलता को नक्सलवाद विरोधी अभियान में मील का पत्थर बताया है।





































