उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले का ऐतिहासिक कड़ा धाम इन दिनों केवल भक्ति के लिए ही नहीं, बल्कि एक बेहद अनोखी परंपरा के लिए चर्चा में है। यहाँ चैत्र मास की अष्टमी और नवमी पर लगने वाला गधों का मेला सिर्फ जानवरों की खरीद-फरोख्त का अड्डा नहीं, बल्कि ‘रिश्तों की मंडी’ भी है।
सदियों से चली आ रही इस परंपरा में दूर-दूर से व्यापारी अपने गधों और खच्चरों को लेकर पहुँचते हैं। लेकिन इस मेले की सबसे अनूठी बात यह है कि यहाँ धोबी समाज के लोग न केवल व्यापार करते हैं, बल्कि अपने बेटा-बेटियों के लिए योग्य जीवनसाथी भी तलाशते हैं।
बुजुर्गों और व्यापारियों के अनुसार, इस मेले में रिश्तों को लेकर एक गजब की परंपरा रही है। पुराने समय में लोग लाठी लेकर आते थे और लाठी के नाप के आधार पर ही सांकेतिक रूप से रिश्तों की बात पक्की की जाती थी। माना जाता है कि यहाँ तय हुए रिश्ते कभी टूटते नहीं हैं। मेले आए व्यापारी बताते हैं कि वे बचपन से आ रहे हैं और इस बार भी मेले के दौरान लगभग 60 रिश्ते तय हो चुके हैं।
अगर किसी कारणवश इन रिश्तों में खटास आ जाए या विवाद हो, तो उसका समाधान भी इसी मेले में होता है। कड़ा की धोबी धर्मशाला में समाज के बड़े-बुजुर्ग बैठते हैं। विवाद होने पर पंचायत बैठती है और सुलह कराई जाती है। यदि कोई दोषी पाया जाता है, तो उस पर दंड (जुर्माना) लगाया जाता है, जिसे समाज की धर्मशाला के विकास के लिए जमा कर दिया जाता है।
यह मेला सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि हमारे समाज को जोड़ने वाली एक डोर है। यहाँ गधे बिकते हैं, व्यापार होता है और आपसी भाईचारे की नई कहानी लिखी जाती है। यह गर्दभ मेला आज के आधुनिक युग में भी आस्था, विश्वास और सामाजिक एकजुटता की एक जीती-जागती मिसाल पेश कर रहा है।
















