देश में दवाओं की अवैध बिक्री और नशीली दवाओं के बढ़ते दुरुपयोग को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। ड्रग कंसल्टेटिव कमेटी (DCC) ने देशभर के मेडिकल स्टोरों पर CCTV कैमरा लगाना अनिवार्य करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस फैसले का सीधा असर दवाओं की रिटेल बिक्री और उनकी निगरानी प्रणाली पर पड़ेगा।
DCC के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, कैमरे दुकान के भीतर ऐसी जगह लगाए जाने चाहिए जहां से दवाओं का लेन-देन और ग्राहकों की गतिविधियां स्पष्ट रूप से दिखाई दें। इसका मुख्य उद्देश्य उन तकनीकी खामियों को दूर करना है, जिनकी वजह से अक्सर संदिग्ध बिक्री रिकॉर्ड में नहीं आ पाती थी। अगर यह फैसला पूरी तरह लागू होता है, तो यह भारतीय फार्मा सेक्टर में सरकारी निगरानी के एक नए युग की शुरुआत होगी।
बैठक में केवल कैमरों तक ही बात सीमित नहीं रही। DCC ने एक मोबाइल ऐप-आधारित इंफॉर्मेशन सिस्टम (MIS) या एक सेंट्रल ड्रग पोर्टल बनाने पर भी सहमति जताई है। इसका मकसद है दवाओं से जुड़े पूरे डेटा को एक छत के नीचे लाना। इसका फायदा इस रूप में माना जा रहा है कि उन दवाओं की रियल-टाइम ट्रैकिंग की जा सकेगी, जिनका दुरुपयोग (Drug Abuse) होने की आशंका सबसे अधिक रहती थी।
यह सख्त निर्णय राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा प्रस्तावित ‘संयुक्त कार्य योजना’ की समीक्षा के बाद लिया गया है। आयोग ने चिंता जताई थी कि एंटीबायोटिक्स और साइकोट्रॉपिक (मनोविकृति नाशक) दवाओं की अनियंत्रित बिक्री से युवाओं और बच्चों में नशे की लत बढ़ रही है। अब राज्य स्तर के बिखरे हुए सिस्टम की जगह एक एकीकृत राष्ट्रीय सिस्टम काम करेगा।
एक तरफ जहां सरकार इसे सुरक्षा के लिहाज से बड़ा कदम मान रही है, वहीं दवा विक्रेताओं में इसे लेकर नाराजगी है। रिटेल डिस्ट्रीब्यूशन केमिस्ट अलायंस (RDCA) और अन्य संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है। देश में कई छोटे दवा विक्रेता ऐसे हैं जिनका मासिक मुनाफा महज 5,000 रुपये के आसपास है। उनके लिए CCTV सिस्टम लगवाना और उसका रखरखाव करना एक बड़ा आर्थिक बोझ होगा। यह नियम छोटे व्यापारियों को बाजार से बाहर कर सकता है।
सरकार इस कदम को आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के साथ जोड़कर देख रही है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की 60,000 से अधिक ब्रांडेड दवा फॉर्मूलेशन का डेटा मैनेज करना, साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना और डेटा प्राइवेसी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
बड़े सवाल जो अभी भी बरकरार हैं जैसे क्या यह नियम ऑनलाइन फार्मेसी पर भी उतनी ही सख्ती से लागू होगा? क्या सरकार छोटे विक्रेताओं को बुनियादी ढांचा खड़ा करने के लिए कोई आर्थिक मदद देगी? मरीजों की गोपनीयता (Patient Privacy) के उल्लंघन को कैसे रोका जाएगा?
दवाओं की कालाबाजारी रोकने की दिशा में यह फैसला ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है, लेकिन इसे धरातल पर उतारने के लिए सरकार को केमिस्टों के विरोध और तकनीकी बाधाओं से निपटना होगा।














