अमूमन शांत और शालीन रहने वाली देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का शनिवार को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में एक अलग ही रूप देखने को मिला। 9वें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस (International Santal Conference) में शामिल होने पहुंचीं राष्ट्रपति ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम लेकर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की।
विवाद की जड़ ‘इंटरनेशनल आदिवासी कॉन्क्लेव’ के लिए अनुमति न मिलना और प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया जा रहा है। राष्ट्रपति इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थीं, लेकिन उनके आगमन पर राज्य सरकार का कोई भी प्रतिनिधि उन्हें रिसीव करने नहीं पहुंचा।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने सीधे तौर पर राज्य प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि संथालों को कार्यक्रम स्थल (वेन्यू) तक पहुंचने से रोक दिया गया। नॉर्थ बंगाल में इस महत्वपूर्ण कॉन्क्लेव के लिए परमिशन नहीं दी गई।”
इतना ही नहीं, राष्ट्रपति के दौरे के दौरान जिस तरह से राज्य सरकार की ओर से प्रोटोकॉल की अनदेखी की गई, उसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
नाराजगी के बीच राष्ट्रपति ने संथाल समुदाय के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए समाज को एकजुट होने का संदेश दिया। राष्ट्रपति ने याद दिलाया कि करीब 240 साल पहले तिलका मांझी ने शोषण के खिलाफ बिगुल फूंका था। इसके 60 साल बाद 1855 में सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो ने ऐतिहासिक ‘संथाल हुल’ (विद्रोह) का नेतृत्व किया।
उन्होंने वर्ष 2003 को समुदाय के लिए मील का पत्थर बताया, जब संथाल भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। उन्होंने उल्लेख किया कि पिछले साल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर संथाल भाषा की ‘ओल चिकी’ लिपि में भारत का संविधान जारी किया गया, जो समुदाय के लिए सम्मान की बात है।

















