ईरान में महिलाओं का विरोध प्रदर्शन अब एक शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन का रूप ले चुका है, जो महात्मा गांधी की सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा की याद दिलाता है। 2022 में महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद शुरू हुआ “वुमन, लाइफ, फ्रीडम” आंदोलन अब बिना नारे लगाए, बिना हिंसा के सड़कों पर हिजाब उतारकर खुली चुनौती दे रहा है। सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के सख्त हिजाब कानूनों के खिलाफ महिलाएं सामूहिक साहस से आगे बढ़ रही हैं।यह आंदोलन गांधीवादी क्यों कहलाता है? क्योंकि यहां हिंसा का कोई स्थान नहीं – महिलाएं चुपचाप सिर खुला रखकर घूमती हैं, दुकानों में जाती हैं और रोजमर्रा की जिंदगी जीती हैं। यह सविनय अवज्ञा है, जहां कानून तोड़ा जाता है, लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से। TV9 की रिपोर्ट के अनुसार, यह विरोध अब सामूहिक हो चुका है, जहां डर की जगह साहस हथियार बन गया है। महिलाएं कहती हैं, “हम खामेनेई की इजाजत नहीं मांग रही हैं, हम बस आजादी जी रही हैं।”
2025 में भी यह सिलसिला जारी है। इजरायल युद्ध, आर्थिक संकट और पानी-बिजली की किल्लत से सरकार कमजोर हुई है, जिससे हिजाब इन्फोर्समेंट मुश्किल हो गया। तेहरान की सड़कों पर बिना हिजाब महिलाएं आम हो गई हैं। नर्गिस मोहम्मदी जैसी कार्यकर्ताएं जेल से भी अहिंसक लोकतांत्रिक बदलाव की बात कर रही हैं।यह आंदोलन सिर्फ हिजाब तक सीमित नहीं – यह महिलाओं की गरिमा, जीवन और स्वतंत्रता की लड़ाई है। महसा अमीनी की मौत ने युवा पीढ़ी को एकजुट किया, जो अब खामेनेई के थोपे नियमों को खारिज कर रही है। गांधी की तरह, यह आंदोलन नैतिक बल से शासन की नींव हिला रहा है।
ईरानी महिलाओं का यह साहस दुनिया को बता रहा है कि दमन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रतिरोध सबसे मजबूत हथियार है। “वुमन, लाइफ, फ्रीडम” अब वैश्विक नारा बन चुका है, जो बदलाव की उम्मीद जगाता है।








