एक तरफ जहां पश्चिम एशिया (इजरायल-ईरान) के हालातों को लेकर वैश्विक राजनीति गरमाई हुई है, वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर भी एक नया मोर्चा खुल गया है। पार्टी के दो दिग्गज और कूटनीति के जानकार मणिशंकर अय्यर और शशि थरूर— विदेश नीति के मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं। दोनों नेताओं के बीच शुरू हुआ यह ‘खुला पत्र’ विवाद अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है।
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब मणिशंकर अय्यर ने एक पत्र के जरिए शशि थरूर के हालिया रुख पर आपत्ति जताई। दरअसल, इजरायल-ईरान संघर्ष और अमेरिका की भूमिका पर थरूर के कुछ बयानों को अय्यर ने पार्टी की पारंपरिक विचारधारा से अलग और ‘अनावश्यक’ माना।
अय्यर ने थरूर के बयानों पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने संकेत दिया कि थरूर का रुख कांग्रेस की मूल विदेश नीति के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। अय्यर ने यहां तक कह दिया कि थरूर को शायद अब अपना ‘अलग रास्ता’ देख लेना चाहिए, जो कि सीधे तौर पर उनके पार्टी लाइन से भटकने का इशारा था।
हमेशा अपनी बेबाक बयानबाजी के लिए मशहूर तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर ने भी चुप रहना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अय्यर के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वरिष्ठ नेता (अय्यर) ने मेरे बारे में कई अनावश्यक और व्यक्तिगत टिप्पणियां की हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। कूटनीति पर स्वस्थ चर्चा होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत हमले।
हैरानी की बात यह है कि जब पार्टी के दो बड़े बौद्धिक चेहरे आपस में भिड़े हुए हैं, तब कांग्रेस नेतृत्व (हाईकमान) ने इस पर पूरी तरह खामोशी अख्तियार कर रखी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी इस समय गुटबाजी को हवा नहीं देना चाहती। विदेश नीति जैसे पेचीदा मामले पर नेतृत्व किसी एक पक्ष का साथ देकर विवाद को और बड़ा नहीं करना चाहता। चुनाव और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के बीच इसे ‘निजी राय’ बताकर टालने की कोशिश की जा रही है।
यह पहली बार नहीं है जब ये दोनों नेता सुर्खियों में हैं, लेकिन विदेश नीति जैसे गंभीर विषय पर इस तरह का ‘लेटर वॉर’ कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेदों को उजागर कर रहा है। अब देखना यह है कि क्या यह विवाद केवल चिट्ठियों तक सीमित रहता है या आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर किसी बड़े बदलाव का संकेत देता है।
















