महाशिवरात्रि पर आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान हो जाएंगे। कोलकाता की भीड़भाड़ और ऐतिहासिक गलियों के बीच, गंगा के पावन तट पर स्थित है एक ऐसा धाम, जहां जीवन और मृत्यु का रहस्य एक साथ दिखाई देता है। यह है भूतनाथ मंदिर, जो निमतल्ला महाश्मशान घाट पर स्थित है—एक ऐसा स्थान जहां आस्था और अंतिम सत्य आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।
करीब 300 साल पुराना यह प्राचीन मंदिर, कोलकाता के प्रसिद्ध निमतल्ला घाट श्मशान भूमि में स्थित है। यहां विराजमान हैं स्वयं भगवान शिव के रूप में बाबा भूतनाथ। इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा है—चिता भस्म से पूजा। जैसे मध्यप्रदेश के उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती होती है, वैसे ही यहां भी दिन में दो बार बाबा का श्रृंगार चिता की राख से किया जाता है। श्मशान की राख से शिव का श्रृंगार—यह दृश्य भक्तों को जीवन की नश्वरता और आत्मा की अमरता का संदेश देता है।
मंदिर गंगा के पावन किनारे स्थित है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं। भक्त बाबा को गंगाजल, पुष्प, धतूरा, दूध, दही और शहद अर्पित कर अभिषेक करते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से बाबा के दरबार में आता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। यहां जल चढ़ाने का विशेष महत्व बताया जाता है।
यह स्थान केवल धार्मिक ही नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी निमतल्ला महाश्मशान घाट पर कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का अंतिम संस्कार किया गया था। इस प्रकार यह घाट आस्था, साहित्य और इतिहास—तीनों का संगम बन जाता है।
भूतनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है—यहां जीवन और मृत्यु के बीच कोई दीवार नहीं है। एक ओर चिताएं जलती हैं, तो दूसरी ओर ‘हर-हर महादेव’ की गूंज सुनाई देती है।
यह मंदिर सिखाता है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नए आरंभ का द्वार है। शिव स्वयं संहार और सृजन के देवता हैं—और भूतनाथ मंदिर इस सत्य का जीवंत प्रतीक है।
यदि आप कोलकाता जाएं, तो केवल पर्यटन स्थलों तक सीमित न रहें। निमतल्ला के इस प्राचीन धाम में जाकर जीवन के उस सत्य का अनुभव करें, जिसे शब्दों में बांधना आसान नहीं। यहां आस्था केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मा का अनुभव है।
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