पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का पारा अपने चरम पर है। वैसे तो पूरे राज्य की नज़र मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट पर टिकी रहती है, लेकिन इस बार कोलकाता की एक और सीट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज़ कर दी है। वह सीट है— जोड़ासांको विधानसभा।
यहाँ मुकाबला किसी पार्टी की विचारधारा से कहीं ऊपर ‘चेहरों की साख’ पर टिक गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस सीट पर मुख्य मुकाबला ‘विजय बनाम विजय’ के बीच है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) दोनों ने ही अपने-अपने ‘विजय’ को मैदान में उतारकर इस जंग को बेहद रोमांचक बना दिया है।
तृणमूल कांग्रेस ने यहाँ से अपने वरिष्ठ हिंदीभाषी नेता और पार्षद विजय उपाध्याय पर भरोसा जताया है। उपाध्याय की गिनती ममता बनर्जी के उन पुराने सिपाही और आंदोलनकारी नेताओं में होती है, जिन्होंने पार्टी के संघर्ष के दिनों में ज़मीनी स्तर पर काम किया है।
विजय उपाध्याय की सबसे बड़ी पूंजी उनकी ‘बेदाग और ईमानदार छवि’ है। मारवाड़ी समाज और पूर्वांचली वोटरों के बीच उनकी गहरी पैठ मानी जाती है। इसके अलावा, बड़बाजार जैसे एशिया के सबसे बड़े व्यवसायिक क्षेत्र की नब्ज से वे पूरी तरह वाकिफ हैं। स्थानीय लोग उन्हें एक सुलभ और सरल नेता के रूप में देखते हैं।
दूसरी ओर, भाजपा ने अपने युवा और अनुभवी पार्षद विजय ओझा को मैदान में उतारा है। ओझा को हल्के में लेना टीएमसी के लिए बड़ी भूल साबित हो सकता है, क्योंकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा है।
विजय ओझा उस दौर के नेता हैं जब कोलकाता में भाजपा का झंडा उठाने वाले गिने-चुने लोग थे। वे लगातार तीन बार से टीएमसी के गढ़ में पार्षद चुने जाते रहे हैं। उनकी कार्यक्षमता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि सालों पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें खुद चिट्ठी लिखकर शुभकामनाएं दी थीं और उन्हें कोलकाता में भाजपा का भविष्य बताया था। आज भाजपा ने उन्हें विधानसभा भेजकर उस भरोसे को अमली जामा पहनाने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जोड़ासांको का वोटर इस बार धर्मसंकट में है। दोनों ही प्रत्याशी अपने क्षेत्र में लोकप्रिय हैं और दोनों की छवि साफ़-सुथरी है। यहाँ हार-जीत का अंतर बहुत कम रहने की उम्मीद है।”
जोड़ासांको में हिंदी भाषी और मारवाड़ी वोटरों की संख्या निर्णायक है। विजय उपाध्याय जहाँ अपनी सादगी और पुराने संबंधों के दम पर वोट मांग रहे हैं, वहीं विजय ओझा अपने संघर्ष और ‘आडवाणी के सिपाही’ वाली छवि के साथ मैदान में हैं।
चूंकि दोनों ही नेता सीधे और बेदाग स्वभाव के माने जाते हैं, इसलिए मतदाता इस उलझन में हैं कि आखिर किसे अपना प्रतिनिधि चुनें। यहाँ मुकाबला अब विकास और पार्टी के साथ-साथ ‘व्यक्तिगत साख’ की परीक्षा बन गया है।
जोड़ासांको की यह ‘विजय बनाम विजय’ की लड़ाई बंगाल चुनाव के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक है। क्या ममता के पुराने सिपाही अपनी ‘बेदाग छवि’ के दम पर जीत की हैट्रिक लगाएंगे, या आडवाणी की वो भविष्यवाणी सच होगी और विजय ओझा भाजपा का परचम लहराएंगे? इसका फैसला आने वाली मतगणना के दिन ही होगा।















