अमेरिका में एक बड़े संवैधानिक संकट और वैश्विक व्यापार युद्ध के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ को ‘अवैध’ घोषित करने के मात्र 3 घंटे बाद ट्रंप ने पलटवार करते हुए नया दांव चल दिया है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू भारत के साथ उनके व्यापारिक संबंध हैं।
कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जब उनसे भारत के साथ ट्रेड डील पर सवाल पूछा गया, तो उनका रुख सख्त था। “कुछ नहीं बदलेगा। भारत टैरिफ देता रहेगा और हम नहीं। पीएम मोदी एक महान इंसान और स्मार्ट लीडर हैं, लेकिन उन्होंने पिछले प्रशासनों को ‘लूटा’ था। हमने अब एक ‘सही डील’ की है और हमने थोड़ा पलटवार किया है।” भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा डील में भारतीय सामानों पर की बात है (जो पहले के 50% से कम है)। ट्रंप का दावा है कि यह डील कोर्ट के फैसले के बावजूद जारी रहेगी।
भले ही ट्रंप 18% टैरिफ पर अड़े हों, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों और व्हाइट हाउस के सूत्रों (BBC/AFP) का कहना है कि स्थिति बदल सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, अब ट्रंप धारा 122 के तहत सभी देशों पर 10% का ग्लोबल टैरिफ लगा रहे हैं। जानकारों के अनुसार, अगर भारत के साथ पिछली डील (18%) अवैध घोषित होती है, तो भारत को भी इस नए 10% के दायरे में आना होगा। यानी तकनीकी रूप से भारत पर टैरिफ कम हो सकता है।
व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि यह 10% का रेट अस्थायी है और वो दोबारा उच्च दरें लागू करने के लिए कानूनी रास्ते तलाश रहे हैं। ट्रंप प्रशासन ने अब तक टैरिफ के जरिए करीब 175 अरब डॉलर की कमाई की है। अब जब ये टैरिफ गैर-कानूनी घोषित हो चुके हैं, तो रिफंड की मांग उठने लगी है।
विश्लेषकों के अनुसार, रिफंड अपने आप नहीं मिलेगा। लगभग 1,000 से ज्यादा कंपनियों ने कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में केस फाइल करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अमेरिकी सरकार को आने वाले समय में अरबों डॉलर के ‘रिफंड क्लेम’ का सामना करना पड़ सकता है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।
जियोपॉलिटिक्स के लिहाज से यह ‘चेस’ के खेल जैसा है। एक तरफ ट्रंप अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत भारत जैसे सहयोगियों पर भी दबाव बनाए रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी न्यायपालिका संविधान की रक्षा की दुहाई दे रही है। भारत के लिए अच्छी खबर यह हो सकती है कि कानूनी बाध्यताओं के कारण 18% का बोझ घटकर 10% पर आ जाए।



















