यह कहानी है बंगाल के उस मिनी-इंडिया की, जहाँ चुनावी हवाएं आईआईटी के फॉर्मूले से भी ज्यादा जटिल हैं और राजनीति की रफ़्तार खड़गपुर जंक्शन की ट्रेनों से भी तेज़। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले में बसा खड़गपुर सदर केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि देश की आधुनिकता और इतिहास का संगम है। एक तरफ IIT खड़गपुर की बौद्धिक विरासत है, तो दूसरी तरफ दुनिया के सबसे लंबे रेलवे प्लेटफॉर्मों में से एक खड़गपुर जंक्शन। लेकिन राजनीति के मैदान में यहाँ की पटरियाँ इतनी सीधी नहीं हैं; यहाँ हर मोड़ पर एक नया ‘जंक्शन’ और एक नई चुनौती खड़ी रहती है।
खड़गपुर सदर का इतिहास किसी रोमांचक थ्रिलर से कम नहीं है। 1951 में अपनी यात्रा शुरू करने वाले इस क्षेत्र ने कई नाम बदले—कभी ‘लोकल’ कहलाया, तो कभी ‘रूरल’ और ‘अर्बन’ में बंटा। 2011 में जब यह खड़गपुर सदर के रूप में उभरा, तो इसने अपने साथ एक ऐसी परंपरा शुरू की जिसने दिग्गजों को भी चौंका दिया। यहाँ 2011 के बाद से कोई भी दल लगातार दो चुनाव नहीं जीत पाया है। खड़गपुर की जनता का मिजाज आईआईटी के रिसर्च पेपर जैसा है—गहरा, पारखी और हर बार कुछ नया तलाशने वाला।
एक दौर था जब कांग्रेस के ज्ञान सिंह सोहनपाल (जिन्हें लोग प्यार से ‘चाचा’ कहते थे) यहाँ की पहचान थे। 2011 में उन्होंने तृणमूल के साथ मिलकर बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन 2016 के चुनाव ने इतिहास बदल दिया। भाजपा के कद्दावर नेता दिलीप घोष ने ‘चाचा’ के अभेद्य किले को 6,309 वोटों से ढहाकर बंगाल की राजनीति में भाजपा के उदय का बिगुल बजा दिया।
लेकिन रोमांच यहीं खत्म नहीं हुआ। साल 2019 एक और उलटफेर हो गया। जब दिलीप घोष सांसद बने और सीट खाली हुई, तो उपचुनाव में तृणमूल के प्रदीप सरकार ने भाजपा को पटखनी दे दी। लेकिन 2021 में बीजेपी की फिर वापसी हुई। विधानसभा चुनावों में भाजपा ने फिर वापसी की और अभिनेता से नेता बने हिरण चटर्जी ने एक करीबी मुकाबले में प्रदीप सरकार को 3,771 वोटों से शिकस्त दी।
खड़गपुर सदर पूरी तरह शहरी इलाका है। यहाँ की जनसंख्या इतनी विविध है कि इसे ‘मिनी इंडिया’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। रेलवे टाउनशिप, आईआईटी कैंपस और म्युनिसिपल एरिया के वोटर्स किसी एक समुदाय या भाषा के बंधन में नहीं बंधे हैं।
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भाजपा का गढ़: 2014 के बाद से लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यहाँ अपनी पकड़ बेहद मजबूत की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस सेगमेंट से 21,906 वोटों की लीड हासिल की।
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लेफ्ट का ढलान: एक समय की ताकतवर वामपंथी ताकतें (CPIM) अब महज 5% वोटों के आसपास सिमट कर रह गई हैं।
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निर्णायक वोटर: 2,39,710 रजिस्टर्ड वोटर्स वाले इस क्षेत्र में रेलवे कर्मचारी और मध्यम वर्ग के उद्योग से जुड़े लोग किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं।
कांग्साबती नदी के किनारे बसा यह शहर, कोलकाता से 120 किमी दूर अपनी अलग राजनीतिक गाथा लिख रहा है। यहाँ का वोटर न केवल आईआईटी की साख का ख्याल रखता है, बल्कि रेलवे जंक्शन जैसी गतिशीलता भी चाहता है। 2024 के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा की पकड़ मजबूत है, लेकिन यहाँ का ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ (सत्ता विरोधी) इतिहास किसी को भी चैन की नींद सोने नहीं देता। अगला चुनाव जब भी होगा, सवाल वही रहेगा: क्या खड़गपुर अपनी ‘बदलाव की परंपरा’ को कायम रखेगा या फिर कोई नया समीकरण यहाँ की पटरियों पर राज करेगा?



















