नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को अमेरिका के कब्जे में लाने की इच्छा जताई है। डेनमार्क का यह स्वायत्त क्षेत्र, जो आर्कटिक में स्थित है, अपनी विशाल खनिज संपदा और रणनीतिक महत्व के कारण ट्रंप की नजरों में है। 2019 में पहली बार ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने की बात की थी, जिसे डेनमार्क ने ‘बकवास’ बताकर खारिज कर दिया था। अब 2026 में, ट्रंप प्रशासन ने एक चार-चरणीय प्लान पर काम शुरू कर दिया है, जिसका उद्देश्य ग्रीनलैंड को अमेरिकी प्रभाव में लाना है। व्हाइट हाउस का दावा है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है, खासकर चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए।
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ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, लेकिन इसकी आबादी मात्र 57,000 है। यहां रेयर अर्थ मिनरल्स, यूरेनियम, तेल और गैस के विशाल भंडार हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ पिघलने से ये संसाधन सुलभ हो रहे हैं। ट्रंप का मानना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए ‘रणनीतिक संपत्ति’ है, जो आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिकी वर्चस्व सुनिश्चित करेगा। व्हाइट हाउस प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने कहा, “हम ग्रीनलैंड अधिग्रहण के विभिन्न विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं, जिसमें सैन्य विकल्प भी शामिल है।” राज्य सचिव मार्को रुबियो ने भी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा प्राथमिकता बताया।
पॉलिटिको की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप का चार-चरणीय प्लान इस प्रकार है:
चरण 1: स्वतंत्रता आंदोलन को बढ़ावा देना – ट्रंप प्रशासन ग्रीनलैंड की स्वतंत्रता की मांग को प्रोत्साहित कर रहा है। ग्रीनलैंड पहले से ही डेनमार्क से अलग होने की सोच रखता है। अमेरिका प्रभावशाली अभियान चलाकर स्थानीय नेताओं और जनता को प्रभावित करेगा, ताकि वे डेनमार्क से अलग हों।चरण 2: आकर्षक डील ऑफर करना – स्वतंत्र होने के बाद, अमेरिका ग्रीनलैंड को आर्थिक सहायता, निवेश और सुरक्षा गारंटी का लुभावना पैकेज देगा। इसमें खनन परियोजनाओं में साझेदारी, बुनियादी ढांचे का विकास और अमेरिकी सैन्य अड्डों का विस्तार शामिल हो सकता है। 1951 के रक्षा समझौते के तहत अमेरिका पहले से ही थुले एयर बेस संचालित करता है।
चरण 3: यूरोप को मनाना – ट्रंप यूरोपीय संघ और नाटो सहयोगियों को समझाएंगे कि ग्रीनलैंड अमेरिकी नियंत्रण में रहने से सभी को फायदा होगा। चीन के आर्कटिक महत्वाकांक्षाओं का हवाला देकर समर्थन जुटाया जाएगा। हालांकि, यूरोपीय देश इस पर चिंता जता रहे हैं।
चरण 4: डेनमार्क पर दबाव बनाना – अगर जरूरी हुआ, तो अमेरिका डेनमार्क पर आर्थिक या सैन्य दबाव डालेगा। डेनिश रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि आक्रमण की स्थिति में सैनिक ‘तुरंत’ जवाब देंगे। ट्रंप ने सैन्य विकल्प को खारिज नहीं किया है, लेकिन कहा है कि अधिग्रहण ‘शांतिपूर्ण’ होगा।
इस प्लान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं तीखी हैं। ग्रीनलैंड की प्रीमियर मुटे ईगेदे ने कहा, “हम बिकाऊ नहीं हैं।” डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने इसे ‘असंगत’ बताया। नाटो सहयोगी चिंतित हैं कि इससे गठबंधन कमजोर होगा। डेमोक्रेट सांसद टेड ल्यू ने चेतावनी दी कि बिना कांग्रेस की मंजूरी के सैन्य कार्रवाई अवैध होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह 19वीं सदी की साम्राज्यवादी सोच है, जो वैश्विक स्थिरता को खतरे में डाल सकती है। ट्रंप का यह कदम अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा है, लेकिन यह डेनमार्क-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण बना सकता है। ग्रीनलैंड के मूल निवासी इनुइट समुदाय भी अपनी संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा की मांग कर रहे हैं। फिलहाल, चर्चाएं जारी हैं, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ। यह देखना बाकी है कि ट्रंप का प्लान सफल होता है या विवादों में फंस जाता है।










