पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगर किसी एक नाम ने दबंगई, टकराव और सत्ता संघर्ष को अपनी पहचान बना लिया है, तो वह नाम है अर्जुन सिंह। उत्तर प्रदेश के बलिया से आए पूर्वांचली समाज का यह नेता सिर्फ एक सांसद या विधायक नहीं, बल्कि जुट मिल इलाकों का बेताज बादशाह माना जाता रहा है।
उत्तर 24 परगना के भाटपाड़ा, जगद्दल और आसपास के औद्योगिक इलाकों में अर्जुन सिंह का नाम लंबे समय तक खौफ और पकड़ दोनों का पर्याय रहा। जुट मिल मजदूर, यूनियन और स्थानीय प्रशासन—सब पर उनकी सीधी या परोक्ष पकड़ की चर्चा आम रही। कहा जाता है कि इन इलाकों में बिना अर्जुन सिंह की सहमति के राजनीतिक सांस लेना भी मुश्किल था।
लेफ्ट फ्रंट के दौर में अर्जुन सिंह ने सीपीएम से सीधी टक्कर ली। जब बंगाल में वामपंथी सत्ता अडिग लगती थी, तब भाटपाड़ा-जगद्दल क्षेत्र में अर्जुन सिंह ने बार-बार सीपीएम की नाक में दम किया। संघर्ष इतना तीखा था कि यह इलाका राजनीतिक हिंसा का हॉटस्पॉट बन गया। ममता बनर्जी के उदय के साथ अर्जुन सिंह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए और कई बार विधायक बने। अर्जुन सिंह ममता के भरोसेमंद पूर्वांचली चेहरे के रूप में उभरे। लेकिन यह रिश्ता कभी सहज नहीं रहा। अर्जुन सिंह की दबंग कार्यशैली और “स्वतंत्र सत्ता केंद्र” वाली राजनीति ममता की केंद्रीकृत शैली से टकराती रही।
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अर्जुन सिंह का भाजपा में जाना बंगाल की राजनीति में बड़ा धमाका था। भाजपा ने उन्हें पूर्वांचली और मजदूर वर्ग के बड़े चेहरे के तौर पर पेश किया। लेकिन भाजपा में भी उनकी राह आसान नहीं रही। भाजपा में शामिल होने के बाद से अर्जुन सिंह की लड़ाई सिर्फ तृणमूल से नहीं, बल्कि अपने ही राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने की बन गई।
अर्जुन सिंह का नाम विवादों और आपराधिक मुकदमों से भी जुड़ा रहा है। उन पर हत्या के प्रयास, दंगा भड़काने, अवैध हथियार रखने, चुनावी हिंसा जैसे गंभीर आरोपों में कई मुकदमे दर्ज हैं। हालांकि समर्थक इन्हें राजनीतिक साजिश बताते हैं, जबकि विरोधियों के लिए यही उनकी “दबंग राजनीति” का प्रमाण है।
आज अर्जुन सिंह न पूरी तरह सत्ता में हैं, न पूरी तरह हाशिये पर। वह पूर्वांचली वोट बैंक का अब भी प्रभावशाली चेहरा हैं लेकिन बदली हुई बंगाल राजनीति में उनका दबदबा पहले जैसा नहीं तृणमूल, भाजपा और स्थानीय समीकरण—तीनों से संघर्ष जारी है
अर्जुन सिंह की कहानी बंगाल की उस राजनीति की कहानी है जहाँ सत्ता सड़क से संसद तक लड़ी जाती है। दबंगई, संघर्ष, विश्वासघात, मुकदमे और सत्ता की भूख सब मिलकर अर्जुन सिंह को एक साधारण नेता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रतिद्वंदी बनाते हैं। क्या अर्जुन सिंह फिर से बंगाल की राजनीति में अपना पुराना दबदबा कायम कर पाएंगे, या यह दौर उनकी सियासी पारी का सबसे कठिन अध्याय बनकर रह जाएगा?





































