अजित पवार की अचानक मौत (प्लेन क्रैश में) ने एनसीपी के दो गुटों के बीच चल रही सुलह की संभावनाओं को झटका दिया है। हाल ही में पुणे और मुंबई के सिविक चुनावों के बाद दोनों गुटों (अजित पवार और शरद पवार) के बीच एकता की चर्चाएं तेज हुई थीं। कुछ विश्लेषकों का मानना था कि अजित पवार ही एकजुट पार्टी के नेता बन सकते थे। लेकिन उनकी मौत ने इन योजनाओं पर पानी फेर दिया। बीबीसी ने लिखा है कि अब सवाल उठ रहा है कि क्या अजित के साथ आए विधायक शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले की अगुवाई स्वीकार करेंगे, या अजित की पत्नी सुनेत्रा पवार या बेटों (पार्थ/जय) को नेता मानेंगे। रिपोर्ट में राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे के हवाले से कहा गया है कि “शायद अजित की मौत परिवार को फिर से एकजुट कर देगी।”
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, अजित पवार एनसीपी के सबसे मजबूत नेता थे, जिनके बिना उनका गुट एकजुट रखना चुनौतीपूर्ण है। संभावित उत्तराधिकारी में सुनेत्रा पवार (राज्यसभा सांसद), प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे या छगन भुजबल जैसे नाम चर्चा में हैं, लेकिन किसी में अजित जैसी जन-आधारित ताकत नहीं है।
नाजुक वक्त में परिवार एकता की उम्मीद बढ़ गई है। 2023 के बंटवारे के बावजूद पारिवारिक स्तर पर रिश्ते बने रहे थे। अब शरद पवार (85 वर्ष) के लिए यह भावनात्मक और राजनीतिक मौका हो सकता है कि अजित के बेटों को वापस मुख्यधारा में लाएं और एनसीपी को एक छत के नीचे लाएं। सुप्रिया सुले को राष्ट्रीय चेहरा माना जाता है, जबकि रोहित पवार राज्य स्तर पर उभर रहे हैं।अगर एकता हुई तो महाराष्ट्र में एनसीपी मजबूत हो सकती है, वरना गुटों का कमजोर होना तय है। अजित की मौत ने पवार विरासत को नया मोड़ दिया है—क्या यह एकता का कारण बनेगी या विभाजन को और गहरा करेगी?





























