नेपाल की सियासत में इन दिनों एक ऐसी ‘मौन क्रांति’ की सुगबुगाहट है, जिसने सदियों पुरानी सामाजिक दीवारों को हिलाकर रख दिया है। नेपाल के युवा और फायरब्रैंड प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए घोषणा की है कि उनकी सरकार देश के दलित समुदाय से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेगी। यह माफी उस ऐतिहासिक अन्याय, छुआछूत और दमन के लिए होगी, जिसे इस समुदाय ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेला है।
प्रधानमंत्री शाह के ‘100 पॉइंट रिफॉर्म एजेंडा’ के तहत अगले 15 दिनों के भीतर यह आधिकारिक माफीनामा जारी किया जाएगा। दक्षिण एशिया के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब कोई चुनी हुई सरकार यह स्वीकार करेगी कि राज्य और सामाजिक व्यवस्था ने अपने ही एक खास समुदाय के साथ गलत किया है। 35 वर्षीय पूर्व रैपर और काठमांडू के मेयर रह चुके बालेंद्र शाह को नेपाल की नई पीढ़ी ‘सिस्टम’ बदलने वाले नेता के रूप में देख रही है।
नेपाल की 3 करोड़ की आबादी में 13% से अधिक हिस्सेदारी रखने वाला दलित समुदाय आज भी हाशिए पर है। सरकार का तर्क है कि सिर्फ कागजी बदलाव काफी नहीं हैं। 2006 में नेपाल ‘छुआछूत मुक्त राष्ट्र’ घोषित हुआ। इसके साथ ही 2011 भेदभाव को आपराधिक श्रेणी में डाला गया। दलित अधिकार कार्यकर्ता सरस्वती नेपाली जैसी महिलाओं के अनुभव बताते हैं कि आज भी ग्रामीण इलाकों में मटके से पानी पीने तक की आजादी नहीं है।
नेपाल के इस फैसले ने भारतीय राजनीति में भी हलचल तेज कर दी है। भारतीय सांसद चंद्रशेखर आजाद ने लोकसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए मांग की है कि भारतीय संसद को भी हजारों सालों के जातिगत अन्याय की नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब नेपाल जैसा छोटा पड़ोसी देश इतनी बड़ी पहल कर सकता है, तो भारत अपनी वंचित आबादी से आधिकारिक माफी कब मांगेगा?
नेपाल की इस पहल ने पूरे दक्षिण एशिया के दर्पण को साफ कर दिया है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अल्पसंख्यकों और दलितों के अधिकारों की बात तो की है, लेकिन अभी तक कोई औपचारिक माफी जैसा कदम नहीं उठाया गया है। यहां स्थिति सबसे चिंताजनक है, जहाँ दलित समुदाय न केवल जातिगत बल्कि धार्मिक भेदभाव की दोहरी मार झेल रहा है। यहां तालिबानी शासन के नए ‘पीनल कोड’ ने ऊंच-नीच की खाई को और गहरा कर दिया है।
नेपाल के प्रतिष्ठित अखबार ‘काठमांडू पोस्ट’ ने सरकार को आगाह किया है कि माफी के बाद की राह और कठिन है। असली चुनौती शिक्षा, नौकरियों में बराबरी और भेदभाव करने वालों को कड़ी सजा दिलाने की है।
अगर बालेंद्र शाह इस ‘माफीनामे’ को जमीन पर उतारने में सफल रहते हैं, तो यह आधुनिक लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। पूरी दुनिया की नजरें अब उस 35 साल के युवा पर टिकी हैं, जो सदियों पुराने जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश कर रहा है।















