भारत में मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-7 को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। खासकर उत्तर प्रदेश में अंतिम चरण में चल रही इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम गलत तरीके से हटाए जाने के आरोप सामने आए हैं।
कई विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरा बताते हुए चुनाव आयोग से तत्काल हस्तक्षेप और स्वतंत्र जांच की मांग की है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर फॉर्म-7 क्या है, इसका इस्तेमाल कब और कैसे किया जाता है।
फॉर्म-7 भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का आधिकारिक दस्तावेज है, जिसका उपयोग मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए किया जाता है। यह प्रक्रिया Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के तहत तय की गई है।
कानूनी रूप से फॉर्म-7 का इस्तेमाल सिर्फ कुछ खास स्थितियों में ही किया जा सकता है:
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मतदाता की मृत्यु हो चुकी हो
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मतदाता स्थायी रूप से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में शिफ्ट हो गया हो
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एक ही व्यक्ति का नाम कई जगह दर्ज हो
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नाम फर्जी, गलत या अयोग्य पाया गया हो
इसका मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची को साफ, सटीक और फर्जी नामों से मुक्त रखना होता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची की व्यापक जांच प्रक्रिया है। इसमें घर-घर सत्यापन, बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा भौतिक जांच और दस्तावेजों का मिलान किया जाता है। इसके साथ ही नाम जोड़ने, हटाने और सुधार से जुड़े दावों और आपत्तियों का निपटारा भी किया जाता है। आम तौर पर यह प्रक्रिया चुनाव से पहले कराई जाती है।
हालिया SIR अभियान के दौरान आरोप लगाए गए कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल नियमों की भावना के खिलाफ किया गया, जिससे कई योग्य मतदाताओं के नाम सूची से हट गए। इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है और विपक्षी दलों ने सत्तारूढ़ दल पर दुरुपयोग का आरोप लगाया है।
फॉर्म-7 को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए हैं:
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कई मतदाताओं को पहले कोई नोटिस नहीं मिला
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उन्हें यह जानकारी भी नहीं दी गई कि उनके खिलाफ फॉर्म-7 दाखिल हुआ है
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चुनाव के करीब या मतदान के दिन नाम कटने की जानकारी मिली
नियमों के मुताबिक, किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का मौका देना जरूरी होता है।
यह भी आरोप लगे कि कुछ इलाकों में सैकड़ों-हजारों फॉर्म-7 एक साथ जमा किए गए और व्यक्तिगत जांच के बजाय सामूहिक तरीके से प्रोसेस किया गया। जबकि कानून के अनुसार हर फॉर्म-7 की अलग-अलग जांच जरूरी होती है। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का दावा है कि नाम कटने की शिकायतें खासतौर पर इन वर्गों से ज्यादा आईं:
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गरीब और प्रवासी मजदूर
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शहरी झुग्गी बस्तियों के लोग
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वरिष्ठ नागरिक
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अल्पसंख्यक समुदाय
इनका कहना है कि इससे मतदान प्रतिशत और प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। निर्वाचन आयोग ने दुरुपयोग के आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि फॉर्म-7 एक जरूरी और कानूनी प्रक्रिया है और SIR के दौरान सभी नियमों का पालन किया जाता है।अगर किसी का नाम गलती से कट गया है, तो फॉर्म-8 के जरिए सुधार या दोबारा नाम जोड़ने की सुविधा उपलब्ध है। आयोग के मुताबिक इसका मकसद किसी को वोट से वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाना है।
चुनाव आयोग ने साफ किया है कि:
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फॉर्म-7 वही व्यक्ति जमा कर सकता है जो शिकायत दर्ज कर रहा हो
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कोई व्यक्ति किसी दूसरे के नाम से फॉर्म जमा नहीं कर सकता
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किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा बड़ी संख्या में फॉर्म जमा करना नियमों के खिलाफ है
फॉर्म-7 को लेकर कई राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। आयोग ने नियमों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की है और कहा है कि प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी ढांचे के तहत चल रही है।
























