कोलकाता के मशहूर कॉलेज स्ट्रीट स्थित ‘कॉफी हाउस’ में धुआं और बहस दोनों चरम पर थे। मेज पर रखे ‘द टेलीग्राफ’ अखबार की सुर्खी हर किसी का ध्यान खींच रही थी। संजय बारू ने वह कह दिया था जिसे कांग्रेस के कई नेता दबी जुबान में भी कहने से डरते थे।
बारू का तर्क था कि जिस तरह सोनिया गांधी (राजनीतिक शक्ति) और मनमोहन सिंह (प्रशासनिक चेहरा) की जोड़ी ने एक दशक तक भाजपा को सत्ता से बाहर रखा, वह ‘केमिस्ट्री’ राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे में नहीं दिखती। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी को “असली लड़ाकू” और Self-made Leader बताकर विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व की चाबी उनके हाथ में देने की बात कह दी।
इस बयान ने बंगाल कांग्रेस के मुख्यालय ‘विधान भवन’ में खलबली मचा दी। एक तरफ पार्टी के कार्यकर्ता ममता बनर्जी की ‘मसल पावर’ और टीएमसी के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ उनके अपने ही पीएम के पूर्व सलाहकार ममता को “मसीहा” घोषित कर रहे थे।
माना जा रहा है कि बंगाल में कांग्रेस के शेर कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी इस बयान से सबसे ज्यादा असहज हुए हैं। उन्होंने समर्थकों से कहा, “अगर दिल्ली में बैठे लोग दीदी को नेता मान रहे हैं, तो हम यहां किसके खिलाफ झंडा उठाएंगे?” मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे कांग्रेस के गढ़ों में कार्यकर्ता असमंजस में पड़ गए। उन्हें लगा कि क्या कांग्रेस ने चुनाव से पहले ही ‘वॉकाओवर’ दे दिया है?
TMC के दफ्तर ‘तृणमूल भवन’ में इस खबर को एक बड़ी जीत की तरह देखा गया। ममता बनर्जी ने खुद तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके सिपहसालारों ने इसे ‘दीदी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता’ के रूप में पेश करना शुरू कर दिया।
वहीं बीजेपी ने इस मौके को लपक लिया: बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष ने एक रैली में चुटकी लेते हुए कहा कि “कांग्रेस खुद मान चुकी है कि उनके पास मोदी जी का मुकाबला करने के लिए कोई चेहरा नहीं है। अब वे बंगाल की उस नेता के पीछे छिपना चाहते हैं जिन्होंने बंगाल को हिंसा की आग में झोंक दिया।”
संजय बारू के इस बयान ने आगामी पांच राज्यों के चुनाव और खासकर बंगाल चुनाव के लिए तीन बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बारू के विचारों से सहमत है? यदि नहीं, तो खंडन में देरी क्यों? एक तरफ मणिशंकर अय्यर के बयान से दक्षिण में पार्टी घिरी थी, अब पूर्व में बारू के बयान ने नया मोर्चा खोल दिया। क्या एंटी-बीजेपी वोट अब कांग्रेस को छोड़कर पूरी तरह टीएमसी की तरफ शिफ्ट हो जाएगा?
बंगाल की गलियों में दीवारें ‘खेला होबे’ के नारों से पुती हैं। एक तरफ बीजेपी की मशीनरी है, दूसरी तरफ ममता का ‘रॉबिनहुड’ जैसा व्यक्तित्व। इनके बीच फंसी कांग्रेस अब अपने ही बुद्धिजीवियों के बयानों के भंवर में है। संजय बारू ने भले ही इसे एक सुझाव की तरह पेश किया हो, लेकिन बंगाल चुनाव की बिसात पर यह एक ‘चेक-मेट’ जैसा साबित हो रहा है।


















