पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर कांग्रेस ने बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह इस बार राज्य में किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और सभी 294 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य की राजनीति तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी टक्कर की ओर बढ़ती दिख रही है।
कांग्रेस का यह अहम निर्णय पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास 10, राजाजी मार्ग पर हुई उच्चस्तरीय बैठक में लिया गया। बैठक में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, पश्चिम बंगाल प्रभारी गुलाम अहमद मीर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार, वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी सहित कई बड़े नेता मौजूद रहे। कुछ नेता डिजिटल माध्यम से भी बैठक से जुड़े। बैठक में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर संगठनात्मक स्थिति, जमीनी हालात और पिछले चुनावों के अनुभवों पर विस्तार से चर्चा हुई।
प्रदेश प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने बैठक के बाद साफ संकेत दिए कि गठबंधन राजनीति ने कांग्रेस के जमीनी कैडर को नुकसान पहुंचाया है। उनका कहना था कि अलग-अलग दलों के साथ गठबंधन करने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास कमजोर हुआ और पार्टी की स्वतंत्र पहचान धुंधली पड़ी। यही वजह है कि नेतृत्व ने सामूहिक रूप से यह तय किया कि अब कांग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और सभी 294 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी।
कांग्रेस का यह फैसला 2021 के विधानसभा चुनाव के अनुभव से भी जुड़ा माना जा रहा है। उस चुनाव में कांग्रेस ने वाम दलों के साथ गठबंधन किया था, लेकिन परिणाम पार्टी के लिए बेहद निराशाजनक रहे — कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। इस हार ने न सिर्फ पार्टी की साख को चोट पहुंचाई, बल्कि कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी गहरा आघात दिया।
राजनीतिक एक्सपर्टों का मानना है कि कांग्रेस अब पश्चिम बंगाल में “री-बिल्डिंग मोड” में है। अकेले चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी को यह मौका देगा कि वह:
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अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान दोबारा स्थापित करे
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जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय और प्रेरित करे
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संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करे
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तृणमूल और भाजपा से अलग वैकल्पिक राजनीति पेश करे
हालांकि यह रास्ता आसान नहीं होगा। मौजूदा समय में राज्य की राजनीति मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के इर्द-गिर्द घूम रही है, ऐसे में कांग्रेस के लिए स्पेस बनाना बड़ी चुनौती होगी।
अप्रैल-मई 2026 में संभावित विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को मजबूत करना और जनता के बीच भरोसा वापस हासिल करना है। अकेले चुनाव लड़ने का फैसला साहसिक है, लेकिन इसका परिणाम पार्टी की जमीनी तैयारी और रणनीतिक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह “अकेले चलो” प्रयोग पश्चिम बंगाल की राजनीति में कोई नया अध्याय लिख पाता है या नहीं।































