बिहार में पटना में NEET की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI को सौंप दिया गया है। सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है जब बिहार पुलिस और पटना पुलिस की जांच पर लगातार सवाल उठ रहे थे। 17 दिन की जांच के बावजूद पुलिस किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी थी, जिससे परिजनों का भरोसा पूरी तरह टूट चुका था।
बता दें कि घटना के सामने आने के बाद पटना पुलिस ने शुरुआती बयान में इसे सामान्य घटना या आत्महत्या की दिशा में मोड़ दिया। सीसीटीवी फुटेज, हॉस्टल प्रशासन और डॉक्टरों के शुरुआती बयानों के आधार पर पुलिस ने जल्दबाजी में निष्कर्ष पेश किया। मामले में 17 दिन बाद जब जांच किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची तो पुलिस फिर उसी शुरुआती थ्योरी के आसपास नजर आने लगी. सवाल यह है कि अगर पहली थ्योरी ही सही थी तो जांच को इतने दिनों तक क्यों घसीटा गया?
मामले की शुरुआत 5 जनवरी को हुई थी जब शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रहकर NEET की तैयारी कर रही छात्रा को अचेत अवस्था में पाया गया। उसे तुरंत प्रभात मेमोरियल अस्पताल ले जाया गया, जहां 6 से 8 जनवरी तक इलाज चला। हालत बिगड़ने पर 9 जनवरी को मेदांता अस्पताल शिफ्ट किया गया। वहीं 11 जनवरी को इलाज के दौरान छात्रा की मौत हो गई। इस बीच करीब 17 दिनों तक चली जांच में पुलिस बार बार अपनी दिशा बदलती रही। जांच की यह दिशाहीनता खुद इस बात का संकेत है कि या तो पुलिस के पास ठोस दिशा नहीं थी या फिर वह किसी दबाव में काम कर रही थी।
परिवार ने मीडिया से बात की और कहा कि पुलिस सुसाइड कहकर केस दबा रही है। परिवार वालों ने छात्रा के फोन रिकॉर्ड्स और CCTV फुटेज की मांग की। परिवार ने दबाव बनाया तो SIT गठित की गई, लेकिन साफ है कि पुलिस की शुरुआती नेग्लिजेंस से देरी हुई।
आप स्वयं समझ सकते हैं कि घटना और जांच की यह पूरी टाइमलाइन अपने आप में कई सवाल खड़े करती है, खासकर तब जब शुरुआत में मामले को सामान्य घटना बताने की कोशिश की गई।
दरअसल, पुलिस विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी आपराधिक मामले में शुरुआती 48 घंटे सबसे अहम होते हैं। लेकिन NEET छात्रा कांड में यही वक्त सबसे ज्यादा उलझन भरा रहा। पुलिस की देरी और अस्पष्टता के कारण यह आशंका गहराई कि कई अहम सबूत या तो नष्ट हो गए या जानबूझकर कर दिए गए। हॉस्टल परिसर, मेडिकल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान समय पर सुरक्षित क्यों नहीं किए गए, यह सवाल आज भी जवाब मांगता है।
घटना के बाद पटना पुलिस ने शुरुआती बयान में आत्महत्या या सामान्य हादसे की आशंका जताई। हैरानी की बात यह रही कि यह सब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले किया गया। इतनी गंभीर घटना में पुलिस ने इतनी जल्दी निष्कर्ष क्यों निकाला, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया पुलिस की शुरुआती थ्योरी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
रिपोर्ट के अनुसार, छात्रा के शरीर पर कई चोटों के निशान थे। गर्दन और कंधे के पास नाखून के गहरे निशान, छाती और कंधे के नीचे खरोंच, प्राइवेट पार्ट पर ताजा चोटें और जबरदस्ती के संकेत मिले। यह तथ्य इस ओर इशारा करते हैं कि छात्रा ने खुद को बचाने की कोशिश की थी। इसके बावजूद शुरुआती जांच में यौन हिंसा की संभावना से इनकार किया गया।
घटना के समय वहां मौजूद लोग, निगरानी व्यवस्था और प्रवेश निकास के रिकॉर्ड जांच के दायरे में क्यों नहीं आए, यह स्पष्ट नहीं है। अगर सब कुछ सामान्य था तो बाद में गिरफ्तारियां क्यों की गईं। और अगर संदेह था तो शुरुआती जांच में उसे नजरअंदाज क्यों किया गया। अगर हॉस्टल प्रशासन पूरी तरह निर्दोष था तो जांच में बार बार उसका नाम क्यों आया, और अगर संदेह था तो समय रहते ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
करीब 17 दिन तक चली बिहार पुलिस की जांच किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी। इन्हीं तमाम सवालों और दबाव के बीच राज्य सरकार ने CBI जांच की सिफारिश की। अब CBI मामले से जुड़े सभी दस्तावेज, मेडिकल रिपोर्ट, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान नए सिरे से जांचेगी। CBI नए सिरे से सबूत जुटाएगी, गवाहों से पूछताछ करेगी और यह परखेगी कि जांच के दौरान क्या क्या चूक हुई।
NEET छात्रा कांड में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अब CBI क्या करेगी.।असली सवाल यह है कि 17 दिनों में क्या खो गया। क्या सबूत मिट गए। क्या सच दब गया और क्या पटना पुलिस की 360 डिग्री घूमती जांच ने इंसाफ की राह को और मुश्किल बना दिया। NEET छात्रा कांड सिर्फ एक मौत का मामला नहीं है। यह बिहार की कानून व्यवस्था, पुलिस की संवेदनशीलता और जांच प्रक्रिया की परीक्षा है। सवाल यह नहीं कि CBI क्या करेगी, सवाल यह है कि क्या अब सच सामने आएगा। इस केस का सच सामने आना अब सिर्फ एक परिवार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है।































