BMC चुनाव ठाकरे बंधुओं (उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे) के लिए सर्वाइवल का सवाल इसलिए है क्योंकि यह मुंबई में उनके राजनीतिक वजूद, विरासत और शिवसेना की पारंपरिक ताकत को बचाने की आखिरी बड़ी लड़ाई मानी जा रही है।शिवसेना की स्थापना बाल ठाकरे ने 1966 में मुंबई में की थी, और 1985 से 2017 तक (लगभग 25-30 साल) अविभाजित शिवसेना ने बीएमसी पर एकछत्र राज किया। यह भारत की सबसे अमीर नगरपालिका है, जिसका सालाना बजट 70-75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। बीएमसी का नियंत्रण न सिर्फ़ आर्थिक ताकत देता है, बल्कि मुंबई की राजनीति, ‘मराठी मानूस’ की पहचान और पार्टी की जड़ों को मजबूत रखता है।
2022 में एकनाथ शिंदे के बगावत से शिवसेना दो फाड़ हो गई। शिंदे गुट को पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह और ज्यादा विधायक मिले, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) कमजोर पड़ गई। 2024 विधानसभा चुनाव में यूबीटी को मुंबई में कुछ सीटें मिलीं, लेकिन कुल मिलाकर हार का सामना करना पड़ा। राज ठाकरे की एमएनएस भी लगातार कमजोर होती गई (2017 बीएमसी में सिर्फ 7 सीटें)।इसलिए 2026 बीएमसी चुनाव में उद्धव और राज ठाकरे ने 20 साल बाद फिर से गठबंधन किया—’मराठी मानूस’, मुंबई की पहचान और उत्तर भारतीय प्रवासियों के मुद्दे पर। यह उनके लिए मेक या ब्रेक है क्योंकि:
- हारने पर मुंबई में ठाकरे ब्रांड और शिवसेना (यूबीटी) की साख खत्म हो सकती है, और और नेता defect कर सकते हैं।
- जीतने पर वे विरासत बचाकर वापसी कर सकते हैं, और भविष्य की लड़ाइयों (जैसे विधानसभा) के लिए मजबूत आधार मिलेगा।
- एग्जिट पोल्स ज्यादातर महायुति (बीजेपी-शिंदे शिवसेना) को 130+ सीटें दे रहे हैं, जबकि ठाकरे गठबंधन को 58-68 सीटें—यह उनके लिए बड़ा झटका होगा।
यह चुनाव सिर्फ़ पार्षदों का नहीं, बल्कि ठाकरे परिवार की राजनीतिक अस्तित्व की जंग है। मुंबई उनका जन्मस्थान और सबसे मजबूत गढ़ है—इसे खोना मतलब राजनीतिक मौत के करीब पहुंचना।








