नई दिल्ली: अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने 7 जनवरी 2026 को घोषणा की कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द्विदलीय रूस प्रतिबंध बिल को “ग्रीनलाइट” दे दिया है। यह बिल रूस से सस्ता तेल खरीदने वाले देशों पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान करता है। ग्राहम ने कहा, “यह बिल राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों को सजा देने की अनुमति देगा जो सस्ता रूसी तेल खरीदकर पुतिन की युद्ध मशीन को ईंधन दे रहे हैं।” मुख्य निशाने पर भारत, चीन और ब्राजील जैसे देश हैं, जो पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से बड़े पैमाने पर डिस्काउंटेड तेल आयात कर रहे हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बिल से भारत पर 500% तक टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप की मंजूरी के बाद यह बिल कांग्रेस में तेजी से आगे बढ़ सकता है, जिससे भारत जैसे देशों के निर्यात पर भारी असर पड़ेगा। भारत वर्तमान में रूस से सबसे अधिक तेल आयात करने वाला देश है, और यह आयात रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए अरबों डॉलर की कमाई दे रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे “500% टैरिफ थ्रेट” करार दिया, जो भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को चुनौती दे सकता है।
ग्राहम ने ट्रंप से व्हाइट हाउस में मीटिंग के बाद यह जानकारी साझा की। बिल में रूसी ऊर्जा निर्यात खरीदने वाले देशों पर सेकेंडरी सैंक्शंस और 500% तक टैरिफ लगाने की शक्ति ट्रंप को मिलेगी। यह “सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025” का हिस्सा है, जिसे महीनों से तैयार किया जा रहा था। ग्राहम ने इसे “ट्रेमेंडस लिवरेज” बताया, जो चीन, भारत और ब्राजील जैसे देशों को रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए मजबूर करेगा। सीनेट में अगले हफ्ते वोट हो सकता है, और द्विदलीय समर्थन से पास होने की संभावना मजबूत है।यह कदम यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की ट्रंप की रणनीति का हिस्सा लगता है। ग्राहम का मानना है कि रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना जरूरी है, क्योंकि सस्ता तेल बेचकर पुतिन युद्ध जारी रख रहे हैं। भारत ने 2022 से अब तक रूस से अरबों डॉलर का तेल खरीदा है, जो उसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा है। लेकिन अब यह बिल भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को तनावपूर्ण बना सकता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं तीखी हैं। भारत और चीन इसे एकतरफा कदम बता रहे हैं, जबकि यूरोपीय सहयोगी समर्थन दे रहे हैं। रूस ने इसे “आर्थिक युद्ध” करार दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बिल लागू हुआ, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल मच सकती है। भारत को वैकल्पिक स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं, जो महंगे होंगे।ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति में यह बिल रूस को अलग-थलग करने का मजबूत हथियार है। देखना होगा कि कांग्रेस इसे कितनी तेजी से पास करती है और प्रभावित देश कैसे जवाब देते हैं। फिलहाल, यह विकास भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है।










