महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए राज्य में नौकरियों और शिक्षा में मुसलमानों के लिए तय 5 फीसदी आरक्षण को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया है। सामाजिक न्याय विभाग ने इस संबंध में जीआर (सरकारी आदेश) जारी कर 2014 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान दिया गया था। सरकार के इस कदम के बाद राज्य की राजनीति गर्मा गई है और विपक्ष ने इसे ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ करार दिया है।
मुस्लिम आरक्षण की कहानी राज्य में समुदाय के पिछड़ेपन को दूर करने की कोशिशों से जुड़ी है। आपको बता दें कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के बाद महाराष्ट्र सरकार ने रिटायर्ड IAS महमूदुर रहमान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। 5 साल के अध्ययन के बाद कमेटी ने पाया कि महाराष्ट्र के 60% मुस्लिम गरीबी रेखा के नीचे हैं। सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी मात्र 4.4% थी और स्नातक आबादी केवल 2.2% थी। कमेटी ने 8% आरक्षण की सिफारिश की थी, लेकिन जुलाई 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने 5% कोटा लागू किया।
जब इस आरक्षण को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, तो नवंबर 2014 में कोर्ट ने नौकरियों में कोटे पर रोक लगा दी थी, लेकिन शिक्षा में 5% आरक्षण को बरकरार रखा था। मुस्लिम नेताओं का आरोप है कि वर्तमान सरकार ने न तो हाईकोर्ट के उस आदेश को लागू किया और अब जानबूझकर इसे पूरी तरह खत्म कर दिया है।
समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख का कहना है कि यह आरक्षण जमीन पर वैसे भी लागू नहीं हो पा रहा था, लेकिन सरकार का इसे रद्द करना उनके ‘मुस्लिम विरोधी’ रुख को साफ दर्शाता है। वहीं, शरद पवार गुट (NCP) का कहना है कि इस फैसले से स्पष्ट है कि बीजेपी अपने गठबंधन में शामिल मुस्लिम नेताओं को भी कोई महत्व नहीं देती।
इस फैसले के बाद अब महाराष्ट्र में आरक्षण की राजनीति एक नए मोड़ पर आ गई है, जहाँ एक ओर मराठा आरक्षण का मुद्दा पहले से ही गरमाया हुआ है, वहीं दूसरी ओर अब मुस्लिम कोटा खत्म होने से ध्रुवीकरण की स्थिति और गहरी हो सकती है।



















