तोप के गोले और झंड़ा फहराते जवान किसी मामूली सीमेंट से बना एक ढांचा भर नहीं था। एक उस डर का प्रतीक था जिसको मिट्टी में मिलाना बेहद जरूरी हो गया था। क्योंकि जब डर के बादल छटते है तभी विकास का सूरज उगता है। गोगुंडा – कभी जंगलों की खामोशी में छिपे डर, बारूद की गंध और अनकही आशंकाओं का प्रतीक रहा है। यह इलाका अब एक नई शुरुआत की ओर बढ़ता दिख रहा है। चार दशकों से जिस नक्सली स्मारक ने इस क्षेत्र पर भय का साया डाल रखा था, वह अब मलबे में तब्दील हो चुका है। यह कार्रवाई सिर्फ एक ढांचे को गिराने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उस मानसिक गुलामी को तोड़ने का प्रयास है, जिसने पीढ़ियों तक ग्रामीणों के मन को जकड़ रखा था।
सरकार का लक्ष्य सिर्फ सत्ता के शिखर तक पहुंचने का ही नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त बनाना है और इस बात का ऐलान खुद गृह मंत्री अमित शाह भी कर चुके हैं। इसी मिशन को 31 मार्च 2026 तक पूरा करने और नक्सलवाद की जड़ें बस्तर से उखाड़कर फेंकने के लिए जवान दिन रात जंगलों की खाक छान रहे हैं। इसी कड़ी में गोगुंडा के जंगलों में बने माओवादी लीडर रमन्ना का स्मारक जवानों ने जमींदोज कर दिया। जिस तेजी के साथ नक्सलवाद का खात्मा बस्तर में हो रहा है उससे उम्मीद है कि जल्द ही बस्तर से माओवाद का नामों निशान तक मिट जाएगा और नकसलवाद मिट्टी में मिल जाएगा।
दरअसल, CRPF की 74 वीं बटालियन के जवान कमांडेंट हिमांशु पांडे के निर्देश पर एंटी नक्सल ऑपरेशन के लिए जंगलों में निकले। सर्चिंग के दौरान जवानों को जंगल में एक नक्सली स्मारक नजर आया। जवानों ने पास जाकर देखा तो पाया कि वहां पर मारे गए नक्सली का स्मारक माओवादियों ने उसकी याद में बना रखा है।
जिस स्मारक को ध्वस्त किया गया, वह किसी सामान्य व्यक्ति का नहीं था। यह स्मारक था कुख्यात माओवादी नेता रमन्ना का जिसका नाम कभी तेलंगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में खौफ का दूसरा नाम माना जाता था। तेलंगाना के वारंगल का रहने वाला रमन्ना माओवादियों की सेंट्रल कमेटी का सचिव रहा था। उस पर तीन राज्यों में कुल मिलाकर लगभग 2.5 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।
रमन्ना की पहचान केवल एक नाम तक सीमित नहीं थी, वह कई बड़े नक्सली षड्यंत्रों और हमलों की रणनीतियों से जुड़ा रहा था। दिसंबर 2019 में उसकी मौत की खबर आई, लेकिन उसकी विचारधारा और नेटवर्क का असर लंबे समय तक महसूस किया गया। इसी प्रभाव को बनाए रखने के लिए संगठन ने ऐसे स्मारकों को शहादत के प्रतीक के रूप में खड़ा किया ताकि डर जिंदा रहे, और असर कायम रहे।
जानकार बताते हैं कि नक्सली स्मारक भावनात्मक श्रद्धांजलि भर नहीं होते। इनके पीछे गहरी मनोवैज्ञानिक रणनीति होती है, ग्रामीणों के मन में भय बैठाना, संगठन की ताकत का प्रदर्शन, नई पीढ़ी को वैचारिक रूप से प्रभावित करना, हिंसा को शहादत के रूप में पेश करना। इसी मानसिक कब्जे को तोड़ना इस कार्रवाई का असली टारगेट था।
स्मारक को तोड़ने से पहले पूरे इलाके में सर्च ऑपरेशन चलाया गया। संभावित खतरे को देखते हुए सुरक्षा घेरा मजबूत किया गया। चारों दिशाओं से मोर्चा संभाला गया ताकि किसी भी तरह की माओवादी हमले को तुरंत रोका जा सके। जब स्मारक पर पहला प्रहार हुआ, वह सिर्फ सीमेंट पर नहीं था वह माओवाद की मानसिक पकड़ पर सीधा वार था।
कुछ ही मिनटों में चार दशक पुराना डर मलबे में बदल गया। पत्थरों की गिरती आवाज़ के साथ वहां मौजूद ग्रामीणों की आंखों में राहत साफ दिखाई दी। सालों से जमा खामोशी जैसे टूट रही थी। एक बुजुर्ग ग्रामीण की आंखें नम थी। बुजुर्ग ने चंद शब्दों में कहा, कई सालों से हम इसे देख रहे थे, हमेशा डर लगा रहता था। आज पहली बार लग रहा है कि हम सच में आज़ाद हैं।
CRPF 74 वीं बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट ने साफ शब्दों में कहा कि माओवाद केवल हथियारों से नहीं लड़ता, वह प्रतीकों और डर के जरिए लोगों के दिमाग पर कब्जा करता है। ऐसे अवैध स्मारकों को हटाना जरूरी है, ताकि डर की जड़ पूरी तरह खत्म हो और विकास का रास्ता खुले। यह बयान बताता है कि सुरक्षा बलों की लड़ाई अब सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं, बल्कि विचारधाराओं के खिलाफ भी है।
स्मारक हटते ही गांव का माहौल बदला हुआ दिखा। विशेषज्ञ मानते हैं कि डर के प्रतीक हटते ही विकास जमीन पर उतरता है। अब यहां सड़क और संचार सुविधाओं का विस्तार, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का विकास तेजी से होगा। हम CRPF और सैन्य बलों की इस कार्रवाई और जज्बे को सलाम करते हैं।


































