दिसंबर 2025 का मध्य भाग भारत की विदेश नीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम बहुल देशों जॉर्डन और ओमान की यात्रा पर हैं, तो दूसरी तरफ विदेश मंत्री एस. जयशंकर इजरायल में हैं। ये दोनों दौरे लगभग एक ही समय पर हो रहे हैं, जो मिडिल ईस्ट की जटिल भू-राजनीति में भारत की संतुलित और स्वतंत्र कूटनीति का स्पष्ट संदेश दे रहे हैं। भारत न तो अरब देशों से दूरी बना रहा है और न ही इजरायल से। बल्कि दोनों पक्षों के साथ मजबूत संबंध बनाकर क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक हित और रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता दे रहा है।पीएम मोदी की यात्रा 15 से 18 दिसंबर तक तीन देशों—जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान—की है। जॉर्डन और ओमान मुस्लिम बहुल देश हैं, जहां भारत के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। जॉर्डन में मोदी ने राजा अब्दुल्ला द्वितीय से मुलाकात की और सीरिया पुनर्निर्माण में सहयोग की बात की। ओमान में सुल्तान हैथम बिन तारिक से वार्ता हो रही है, जहां भारत-ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर हस्ताक्षर की उम्मीद है। यह समझौता दोनों देशों के व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखता है। ओमान ने 1971 के युद्ध में भारत का खुला समर्थन किया था और आज भी रक्षा सहयोग में महत्वपूर्ण पार्टनर है।
गौरतलब है कि मिडिल ईस्ट में चल रहे इजरायल-हमास संघर्ष और क्षेत्रीय तनाव के बीच मोदी की इन यात्राओं से भारत अरब दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि वह फिलिस्तीन मुद्दे पर संवेदनशील है और शांति की वकालत करता है। भारत ने हमेशा दो-राज्य समाधान का समर्थन किया है। साथ ही, ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए खाड़ी देशों से संबंध मजबूत कर रहा है।दूसरी ओर, विदेश मंत्री एस. जयशंकर 16-17 दिसंबर को इजरायल की दो दिवसीय यात्रा पर हैं। उन्होंने राष्ट्रपति आइजेक हर्जोग, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और विदेश मंत्री गिदोन सार से मुलाकात की। चर्चा का फोकस तकनीक, अर्थव्यवस्था, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग पर रहा। भारत-इजरायल के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) जल्द पूरा करने पर जोर दिया गया। जयशंकर ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की जीरो टॉलरेंस नीति दोहराई और क्षेत्रीय शांति के लिए समर्थन जताया। यह यात्रा नेतन्याहू की प्रस्तावित भारत यात्रा की तैयारी भी है।ये समानांतर दौरे कोई संयोग नहीं हैं। मिडिल ईस्ट में इजरायल और अरब देशों के बीच सामान्यीकरण की प्रक्रिया (अब्राहम समझौते) चल रही है, लेकिन गाजा संकट ने तनाव बढ़ाया है। ऐसे में भारत अपनी ‘डि-हाइफेनेटेड’ नीति अपनाकर दोनों पक्षों से संबंध बनाए रख रहा है। यह नीति भारत को IMEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर) जैसे प्रोजेक्ट्स में मजबूत भूमिका देती है, जो जॉर्डन और इजरायल दोनों से जुड़ा है।
कुल मिलाकर, इन दौरों का मुख्य संदेश है—भारत एक उभरती महाशक्ति है जो क्षेत्रीय ध्रुवीकरण से दूर रहकर अपने हितों को प्राथमिकता देता है। मुस्लिम देशों में मोदी की मौजूदगी अरब दुनिया को भरोसा देती है, जबकि इजरायल में जयशंकर की यात्रा रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करती है। यह संतुलन न केवल मिडिल ईस्ट में भारत की विश्वसनीयता बढ़ाता है, बल्कि वैश्विक मंच पर ‘विश्व गुरु’ की छवि को भी मजबूत करता है। आने वाले दिनों में इन यात्राओं से नए समझौते और सहयोग सामने आएंगे, जो भारत की कूटनीतिक सफलता का प्रमाण होंगे।








































