पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद जिला राज्य की राजनीति में हमेशा खास रहा है। यहां की आबादी में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है और लंबे समय से यह इलाका तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, सवाल उठने लगे हैं—क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुस्लिम मतदाताओं का मोह भंग हो रहा है?
मुर्शिदाबाद के गांवों और कस्बों में बातचीत करने पर एक मिश्रित तस्वीर सामने आती है। कुछ लोग कहते हैं कि ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं चलाईं—कन्याश्री, सबूज साथी, छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं से फायदा हुआ।
वहीं, दूसरी ओर बेरोज़गारी, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप, और कानून-व्यवस्था को लेकर नाराज़गी भी सुनाई देती है। युवा मतदाता खासकर यह सवाल कर रहे हैं कि सरकारी योजनाओं के बाद स्थायी रोज़गार क्यों नहीं मिला? यही असंतोष विपक्ष को मुद्दा दे रहा है।
कांग्रेस और वाम दल मुर्शिदाबाद में अपनी पुरानी पकड़ वापस पाने की कोशिश में हैं, वहीं भाजपा भी विकास और सुरक्षा के मुद्दे उठाकर जगह बनाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष का कहना है कि ममता सरकार ने वादे तो किए, लेकिन ज़मीनी बदलाव सीमित रहा। यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि मुस्लिम मतदाता पूरी तरह ममता से दूर हो गए हैं। लेकिन इतना साफ है कि पहले जैसी एकतरफा समर्थन की तस्वीर अब धुंधली पड़ रही है। वोटर अब सवाल पूछ रहा है, तुलना कर रहा है और विकल्प देख रहा है।
बंगाल की राजनीति को समझने के लिए उसकी सांस्कृतिक आत्मा को समझना ज़रूरी है। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की पंक्तियां आज भी यहां के मन को छूती हैं—
“যদি তোর ডাক শুনে কেউ না আসে, তবে একলা চলো রে”
(अगर तुम्हारी पुकार पर कोई न आए, तो भी अकेले चलते रहो)
यह पंक्ति आज मुर्शिदाबाद के मतदाता पर भी लागू होती दिखती है—वह भावनाओं से नहीं, अपने विवेक से आगे बढ़ने की सोच में है।मुर्शिदाबाद में चुनाव ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं दिख रहा, लेकिन मुकाबला अब भी खुला है। मुस्लिम मतदाता पूरी तरह छिटका नहीं है, पर वह अब पहले से ज्यादा सजग और सवाल करने वाला ज़रूर हो गया है। चुनाव का नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन पार्टी भरोसे के साथ-साथ भविष्य की ठोस तस्वीर पेश कर पाती है।






































