नवाबों के शहर की ऐतिहासिक लखनऊ यूनिवर्सिटी (LU) इन दिनों पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव का ‘ट्रेलर’ दिखाने के लिए चर्चा में है। लाल बारादरी की 200 साल पुरानी दीवारों के पीछे जो सुगबुगाहट शुरू हुई थी, वह अब ‘नमाज़ बनाम हनुमान चालीसा’ की उस पिच पर पहुँच गई है, जहाँ से उत्तर प्रदेश की राजनीति का रास्ता साफ होता है।
इसे महज एक कैंपस विवाद कहना गलत होगा। यह सीधे तौर पर विचारधाराओं की जंग है, जिसमें एक तरफ ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का ढाल है, तो दूसरी तरफ ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की ललकार।
200 साल पुरानी मुगलकालीन इमारत ‘लाल बारादरी’ में स्थित मस्जिद को लेकर शुरू हुआ विवाद अब धार्मिक उन्माद, कानूनी नोटिस, पुलिस बल और धरने तक पहुँच चुका है। रमजान के पवित्र महीने में शुरू हुए इस विवाद ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली और छात्रों के बीच वैचारिक ध्रुवीकरण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लाल बारादरी एक ASI-प्रोटेक्टेड (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) ऐतिहासिक इमारत है, जिसमें एक मस्जिद स्थित है। वर्षों से मुस्लिम छात्र यहाँ नमाज़ अदा करते आ रहे हैं। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने सुरक्षा और स्ट्रक्चरल रिपेयर का हवाला देते हुए इमारत की बैरिकेडिंग कर उसे ताला लगा दिया। मुस्लिम छात्रों का कहना है कि प्रशासन ने बिना किसी पूर्व सूचना के नमाज़ रोकने के लिए यह कदम उठाया है, जो कि भेदभावपूर्ण है।
आपको बता दें कि 23 फरवरी को जब छात्रों को मस्जिद जाने से रोका गया, तो मामला गरमा गया। मुस्लिम छात्रों ने सड़क पर ही नमाज़ पढ़ने का प्रयास किया। इस दौरान कैंपस में एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला। अचानक NSUI, समाजवादी छात्र सभा और AISA से जुड़े हिंदू छात्र मुस्लिम सहपाठियों के समर्थन में उतर आए। हिंदू छात्रों ने नमाज़ पढ़ रहे मुस्लिम छात्रों के चारों ओर ‘ह्यूमन चेन’ बनाई ताकि वे शांतिपूर्वक इबादत कर सकें। विरोध स्वरूप छात्रों ने प्रशासन द्वारा लगाई गई बैरिकेडिंग को गिरा दिया। जहाँ सोशल मीडिया पर इसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ बताया गया, वहीं कुछ गुटों ने इसे अनुशासनहीनता करार दिया।
एक दिन पहले की घटना के विरोध में 24 फरवरी को कैंपस का माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। छात्रों के एक गुट ने कैंपस में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए और लाल बारादरी की ओर कूच किया। नमाज़ विवाद के विरोध में छात्र प्रॉक्टर ऑफिस के बाहर धरने पर बैठ गए और हनुमान चालीसा का पाठ करने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि “विश्वविद्यालय पढ़ने की जगह है, यहाँ किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि नहीं होनी चाहिए।”
विवाद बढ़ता देख लखनऊ पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। हसनगंज पुलिस की रिपोर्ट पर 13 छात्रों को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया है। सभी 13 छात्रों को 50,000 रुपये पर्सनल बॉंड और उतनी ही राशि की दो जमानतें जमा करने का आदेश दिया गया है। यह बॉन्ड एक वर्ष तक परिसर में शांति बनाए रखने की गारंटी के तौर पर लिया जा रहा है।
छात्रों के खिलाफ धारा-126/135 BNSS के तहत मामला दर्ज है। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों द्वारा नारेबाजी और प्रदर्शन से ‘लोक शांति’ भंग होने और सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का प्रबल खतरा है।
फिलहाल लखनऊ यूनिवर्सिटी कैंपस छावनी में तब्दील है। एसीपी (ACP) कोर्ट में छात्रों की पेशी और भारी पुलिस बल की मौजूदगी ने कैंपस की शैक्षणिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। आम छात्र जहाँ परिसर में शांति और पढ़ाई का माहौल चाहते हैं, वहीं प्रशासन के ‘बिना नोटिस’ वाले फैसले और छात्रों के ‘धार्मिक शक्ति प्रदर्शन’ ने लखनऊ की इस प्रतिष्ठित संस्था की साख को दांव पर लगा दिया है।क्या यह विवाद सुलझ पाएगा या नोटिस की कार्रवाई आग में घी का काम करेगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।


















