14 फरवरी… जब शहरों में गुलाब बिक रहे थे, रेस्टोरेंट्स में मोमबत्तियां जल रही थीं, उसी वक्त Noida के सेक्टर-107 की एक सुनसान सड़क पर खून बह रहा था। एक कार के भीतर ‘इश्क’ की आखिरी सांसें चल रही थीं… और कुछ ही मिनटों में दो जिंदगियां हमेशा के लिए खामोश हो गईं।
दिल्ली के त्रिलोकपुरी का रहने वाला 32 साल का सुमित। नोएडा के सलारपुर की 26 साल की रेखा। करीब 15 साल पहले शुरू हुई ये प्रेम कहानी वक्त के साथ गहरी होती गई। दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं। परिवारों से छिपकर मुलाकातें, भविष्य के सपने, शादी के वादे… सब कुछ था।
लेकिन कहते हैं, जब रिश्ते में भरोसा टूटता है, तो दर्द खतरनाक रूप ले सकता है। शुक्रवार शाम दोनों अपने-अपने घरों से निकले… और फिर वापस नहीं लौटे। सुमित के परिवार ने दिल्ली के मयूर विहार थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई। रेखा के घरवाले भी बेचैन थे।
शनिवार दोपहर दादरी रोड, पिलर नंबर-84 के पास खड़ी एक कार ने राहगीरों का ध्यान खींचा। दरवाजे अंदर से लॉक थे।
जब पुलिस पहुंची और कार खुलवाई गई, तो अंदर का मंजर दिल दहला देने वाला था— सामने की सीट पर रेखा… सिर से खून बह रहा था। बगल में सुमित… उसके हाथ में पिस्टल थी।
जांच में सामने आया—पहले रेखा को गोली मारी गई… फिर सुमित ने खुद को भी उड़ा लिया। इस क्राइम स्टोरी का सबसे दर्दनाक और अहम सुराग बना सुमित का आखिरी व्हाट्सऐप मैसेज। “मैं सुमित मरने जा रहा हूं… मेरे मरने की जिम्मेदार रेखा है… उसने 15 साल साथ बिताया, शादी का वादा किया, लेकिन अब वो किसी और से शादी करने जा रही है…”
इन शब्दों में टूटा हुआ भरोसा था… बेबसी थी… और शायद जुनूनी गुस्सा भी। पुलिस के मुताबिक, कार में जबरन घुसने के निशान नहीं थे। दोनों अपनी मर्जी से साथ थे। हथियार कहां से आया, लाइसेंसी था या अवैध—इसकी जांच जारी है। मोबाइल डेटा और सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं।
रेखा के घर में जहां कभी शादी की तैयारियों की बातें होती थीं, वहां अब सन्नाटा है। सुमित के माता-पिता, जो बेटे की तलाश में थे, अब उसकी लाश के सामने खड़े हैं। वैलेंटाइन डे… जो प्यार का दिन माना जाता है… उसी दिन दो घरों के चिराग बुझ गए। यह सिर्फ एक मर्डर-सुसाइड केस नहीं है। यह उस मानसिक तूफान की कहानी है, जहां प्यार अधिकार में बदल जाता है… और अधिकार हिंसा में।
एक तरफ टूटा वादा… दूसरी तरफ टूटा धैर्य… और बीच में दो जिंदगियां खत्म।
नोएडा की उस सड़क पर अब सब कुछ सामान्य है। लेकिन उस कार के शीशों पर जमे खून के निशान शायद बहुत देर तक यह सवाल पूछते रहेंगे— क्या इश्क इतना कमजोर था… या इंसान इतना अधीर? यह वैलेंटाइन डे… गुलाबों से ज्यादा गोलियों के लिए याद रखा जाएगा।





















