दिल्ली की सत्ता के गलियारों में पिछले चार साल से जो धुआं उठ रहा था, अदालत के एक फैसले ने उसे साफ कर दिया। ‘शराब घोटाला’—एक ऐसा शब्द जिसने भारतीय राजनीति के सबसे तेजी से उभरते सितारे अरविंद केजरीवाल और उनके ‘शिक्षा मॉडल’ के नायक मनीष सिसोदिया की किस्मत को कालकोठरी की सलाखों के पीछे धकेल दिया था। लेकिन 27 फरवरी 2026 को राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले ने न केवल इन नेताओं को ‘बेदाग’ घोषित किया, बल्कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसियों की साख पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
कहानी शुरू होती है नवंबर 2021 से। ‘आम आदमी पार्टी’ की सरकार दिल्ली में एक नई आबकारी नीति लेकर आई। मकसद था—सरकारी नियंत्रण हटाकर शराब व्यापार का निजीकरण करना। सरकार का दावा था कि इससे 9,000 करोड़ रुपये का राजस्व आएगा। लेकिन, विपक्ष ने इसे ‘भ्रष्टाचार का ब्लूप्रिंट’ बताया।
जुलाई 2022 में दिल्ली के मुख्य सचिव की एक ‘सीक्रेट रिपोर्ट’ ने बम फोड़ा। आरोप लगा कि शराब ठेकेदारों को 144 करोड़ रुपये की छूट दी गई और बदले में ‘साउथ ग्रुप’ से 100 करोड़ की रिश्वत ली गई। इसी रिपोर्ट ने CBI और ED के लिए दिल्ली सचिवालय के दरवाजे खोल दिए।
भारतीय राजनीति ने शायद ही कभी देखा होगा कि एक साथ एक राज्य के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और कद्दावर सांसद जेल में हों।
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मनीष सिसोदिया: ‘शिक्षा क्रांति’ के चेहरे से ‘कैदी नंबर 1’ बनने तक का सफर। 17 महीने की लंबी कैद।
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संजय सिंह: संसद की बुलंद आवाज को खामोश करने की कोशिश।
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अरविंद केजरीवाल: 21 मार्च 2024 की वह काली रात, जब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने देश के इतिहास में पहली बार एक ‘सिटिंग मुख्यमंत्री’ को गिरफ्तार किया।
इस घटना के बाद पूरा देश दो धड़ों में बंट गया। एक तरफ ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ नैरेटिव था, तो दूसरी तरफ ‘विपक्ष मुक्त भारत’ का आरोप।अदालत के भीतर की बहस किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं थी। जांच एजेंसियों ने दावा किया कि “मोबाइल फोन तोड़े गए,” “डिजिटल सबूत मिटाए गए,” और “सरकारी गवाहों ने कबूलनामा किया।
लेकिन, इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने इन दावों की धज्जियां उड़ा दीं। न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि “सिर्फ बयानों और अनुमानों के आधार पर किसी को जेल में नहीं रखा जा सकता। एजेंसियां यह साबित करने में नाकाम रहीं कि एक भी रुपया रिश्वत के तौर पर केजरीवाल या सिसोदिया की जेब तक पहुंचा।
अदालत ने इसे सबूतों की कंगाली करार दिया। यह जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ा ‘सेटबैक’ है, जो सालों से इस केस को अपनी सबसे बड़ी कामयाबी बता रही थीं। इस फैसले के राजनीतिक मायने भी किसी सुनामी से कम नहीं हैं। केजरीवाल के ‘कट्टर ईमानदार’ की छवि पर जो कालिख लगी थी, उसे कोर्ट ने धो दिया है। अब केजरीवाल इसे ‘विक्टिम कार्ड’ के बजाय ‘वाइल्ड कार्ड’ की तरह इस्तेमाल करेंगे।
वहीं बीजेपी ने इस घोटाले को हर चुनाव में मुद्दा बनाया था। अब ‘आप’ आक्रामक होकर पूछेगी—”अगर घोटाला नहीं हुआ, तो हमारे नेताओं के जीवन के कीमती साल किसने छीने?” यह फैसला ‘इंडिया गठबंधन’ के लिए ऑक्सीजन का काम करेगा। अन्य राज्यों के विपक्षी नेता अब केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ और मुखर होंगे।
यह मामला सिर्फ शराब नीति का नहीं था, यह ‘नैरेटिव’ की लड़ाई थी। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया भले ही कोर्ट से बरी हो गए हैं, लेकिन राजनीति की अदालत में यह मुकदमा कभी खत्म नहीं होगा।
क्या एजेंसियां हार मान लेंगी? मुमकिन नहीं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे अभी खुले हैं। लेकिन दिल्ली की सड़कों पर ‘आप’ कार्यकर्ताओं का जश्न यह बता रहा है कि उन्होंने यह राउंड जीत लिया है। सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं—यह जुमला आज दिल्ली की हवाओं में तैर रहा है।
केजरीवाल और सिसोदिया की इस ‘क्लीन चिट’ ने दिल्ली की राजनीति की दिशा बदल दी है। क्या यह फैसला आगामी चुनावों में ‘आप’ को एक नई शक्ति देगा? या फिर जांच एजेंसियां नए सबूतों के साथ वापसी करेंगी?

















