मार्च का महीना बस आने ही वाला था। दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव में घर नंबर 313 की दीवारें अभी भी नई खुशबू से महक रही थीं। नए घर में सामान के कार्टन खुले नहीं पड़े थे, क्योंकि गृह प्रवेश की तारीख तय होने वाली थी। शांभवी की माँ, जो एयरफोर्स बाल भारती स्कूल में पढ़ाती थीं, हर सुबह बेटी के कमरे में जाकर उसकी फ्लाइट यूनिफॉर्म को सहलातीं और मुस्कुरातीं। “बेटा, अब बस थोड़े दिन… शादी की तैयारियां शुरू करनी हैं,” वो मन ही मन सोचतीं।
शांभवी पाठक, महज 25 साल की, लेकिन आसमान की बेटी। बचपन से ही आसमान उसके सपनों का हिस्सा था। एयरफोर्स बाल भारती स्कूल की वो छात्रा जो हमेशा सबसे आगे रहती, क्लास में सबसे ऊंची उड़ान भरने वाली बातें करती। मुंबई यूनिवर्सिटी से एयरोनॉटिक्स में ग्रेजुएशन, फिर न्यूजीलैंड जाकर कमर्शियल पायलट ट्रेनिंग। Frozen ATPL, फर्स्ट ऑफिसर की पोस्ट—सब कुछ इतनी तेजी से हासिल किया कि परिवार को लगता था, ये लड़की तो वाकई आसमान की चुनी हुई है।
शांभवी 2022 से VSR वेंचर्स में फर्स्ट ऑफिसर के तौर पर काम कर रही थी। Learjet 45 जैसी छोटी लेकिन तेज मशीन उड़ाना उसकी जिम्मेदारी थी। हर उड़ान के बाद वो घर फोन करती, “माँ, आज फिर 30,000 फीट पर थी… लगता है जैसे मैं बादलों से बात कर रही हूं।” माँ हंसकर कहतीं, “बस सुरक्षित उतर आना, बाकी बादलों से बातें बाद में करना।”
शादी की बातें चल रही थीं। एक अच्छा लड़का मिला था—शांत, समझदार, और सबसे बड़ी बात, वो शांभवी की महत्वाकांक्षा को समझता था। मार्च में शादी तय हो चुकी थी। माँ ने तो शादी का लहंगा भी चुन लिया था—लाल-गोल्डन, जिसमें शांभवी की मुस्कान और भी खिल उठती। घर में मेहमानों की लिस्ट बन रही थी, रिश्तेदारों से बातें हो रही थीं। पड़ोसी कहते, “शांभवी दीदी की शादी में तो पूरा मोहल्ला नाचेगा!” लेकिन किस्मत ने कुछ और लिख रखा था।
28 जनवरी 2026 की सुबह। मुंबई एयरपोर्ट से Learjet 45 उड़ा। कैप्टन सुमित कपूर कमान संभाले हुए थे, शांभवी को-पायलट। विमान में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार और कुछ अन्य लोग सवार थे। बारामती एयरस्ट्रिप की तरफ जा रहा था। शांभवी ने सुबह-सुबह अपनी दादी को व्हाट्सएप पर मैसेज किया था—”Hi, good morning, Dadda.” दादी ने जवाब दिया, “Good morning, Chini.” वो प्यार भरा नाम, जो बचपन से चला आ रहा था। दादी को अंदाजा भी नहीं था कि ये उनका आखिरी संदेश होगा।
विमान बारामती पहुंचा। लैंडिंग की कोशिश हुई। पहली बार मिस हो गई। दूसरी कोशिश में… अचानक सब कुछ बदल गया। कॉकपिट से आखिरी शब्द गूंजे—”Oh s***”—और फिर आग की लपटें, धुआं, और सन्नाटा। सफदरजंग एनक्लेव में फोन बजा। माँ ने रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं, सिर्फ रोने की आवाज। “शांभवी… नहीं रही।”
माँ का हाथ कांप गया। फोन गिर पड़ा। घर में जो खुशियां बसने वाली थीं, वो पल भर में मातम बन गईं। अब वो घर सन्नाटे में डूबा है। नए कार्टन अभी भी बंद पड़े हैं। शादी का लहंगा अलमारी में लटका है, जिसे कभी ट्राय नहीं किया गया। माँ कमरे में बैठी रहती हैं, शांभवी की फोटो को छूती हैं और रोती रहती हैं।
“क्यों? वो तो इतनी खुश थी… आसमान उसका था, फिर क्यों इतनी जल्दी थम गई उड़ान?” पड़ोसी याद करते हैं—शांभवी की वो मुस्कान, जो मोहल्ले में हर किसी को नमस्ते कहती थी। वो आत्मविश्वास, जो कभी नहीं डगमगाया। दोस्त कहते हैं, “वो लड़की जो कभी हार नहीं मानती थी, आज हम सब हार गए हैं।” शांभवी की कहानी अब सिर्फ एक प्लेन क्रैश की नहीं रही। ये अधूरे सपनों की कहानी है। एक बेटी की, जो माँ के लिए दुनिया जीतने निकली थी। एक पायलट की, जो आसमान को जीत रही थी। एक दुल्हन की, जिसकी शादी मार्च में होनी थी। और एक परिवार की, जिसके टूटने की आवाज आज भी गूंज रही है।
कभी-कभी तकदीर इतनी क्रूर हो जाती है कि वो हमें याद दिलाती है—जिंदगी कितनी नाजुक है। एक “good morning” मैसेज, एक हंसी, एक सपना… और फिर सब खत्म। शांभवी, तुम्हारी उड़ान थम गई, लेकिन यादें… वो हमेशा उड़ती रहेंगी।































