सोमनाथ मंदिर केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, अस्मिता और अदम्य आस्था की जीवंत गाथा है। अरब सागर के तट पर खड़ा यह मंदिर समय-समय पर आक्रमणों, सत्ता परिवर्तन और वैचारिक संघर्षों का साक्षी रहा, लेकिन हर बार टूटकर भी और अधिक दृढ़ संकल्प के साथ पुनः खड़ा हुआ। यह कहानी सिर्फ पत्थरों के ढहने और बनने की नहीं, बल्कि उस चेतना की है जो सदियों से भारतीय सभ्यता को जीवित रखे हुए है। जनतंत्र टीवी से विशेष बातचीत में प्रख्यात इतिहासकार ओमजी उपाध्याय ने सोमनाथ से जुड़ी ऐसी अनकही कहानियों और ऐतिहासिक तथ्यों को साझा किया, जो इस मंदिर को एक धार्मिक धरोहर से कहीं आगे, राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बनाते हैं।
मुगल काल: आस्था पर सत्ता का प्रहार
मध्यकाल में सोमनाथ मंदिर विदेशी आक्रमणों का प्रमुख लक्ष्य बना। मुगल काल से पहले ही महमूद ग़ज़नवी ने 11वीं शताब्दी में मंदिर को ध्वस्त किया था, जिसे बाद में भारतीय शासकों ने पुनर्निर्मित किया। मुगल शासन के दौरान, विशेषकर औरंगज़ेब के काल में, सोमनाथ एक बार फिर धार्मिक कट्टरता का शिकार बना। मंदिर को तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराया गया। यह दौर केवल एक मंदिर के ध्वंस का नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना को दबाने के प्रयास का प्रतीक था।
मराठा काल: स्वाभिमान की वापसी
18वीं शताब्दी में जब मराठा शक्ति का विस्तार हुआ, तब सोमनाथ के पुनर्निर्माण की भावना ने फिर से जन्म लिया। पेशवा बाजीराव और इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने देशभर के कई मंदिरों के साथ सोमनाथ के पुनरुद्धार की पहल की। यह काल भारतीय स्वाभिमान के पुनर्जागरण का संकेत था।
ब्रिटिश काल: आस्था बनाम औपनिवेशिक नीति
ब्रिटिश शासन के दौरान सोमनाथ मंदिर उपेक्षा का शिकार रहा। अंग्रेजों ने इसे केवल एक ऐतिहासिक स्थल के रूप में देखा, न कि राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में। मंदिर जीर्ण अवस्था में रहा, लेकिन लोगों की आस्था जीवित रही। यही आस्था आगे चलकर स्वतंत्र भारत में इसके पुनर्निर्माण की नींव बनी।
जब राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की एक ना सुनी
आज से सात दशक पहले 11 मई, 1951 को गुजरात में सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन हुआ था, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था। वहीं, प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे, जिसपर पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आपत्ति जताई थी और उनके शामिल होने का विरोध किया था।
मुख्य कारण:
- धर्मनिरपेक्षता की चिंता: नेहरू का मानना था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक प्रमुख का किसी एक धर्म के कार्यक्रम में जाना, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है और इससे गलत राजनीतिक संकेत जा सकता है।
- धार्मिक पुनरुत्थानवाद: नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को ‘धार्मिक पुनरुत्थानवाद’ का प्रयास मानते थे और नहीं चाहते थे कि सरकार का प्रमुख इसमें शामिल हो, खासकर ऐसे समय में जब देश में सांप्रदायिक सद्भाव बनाना जरूरी था।
- संवेदनशील समय: विभाजन के तुरंत बाद, देश नाजुक दौर से गुजर रहा था, और नेहरू को डर था कि ऐसे कार्यक्रम से सांप्रदायिक भावनाएं भड़क सकती हैं और पुराने घाव फिर से हरे हो सकते हैं।
- सरकारी धन का उपयोग: नेहरू ने मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए सरकारी धन के उपयोग का भी विरोध किया था और चाहते थे कि यह पूरी तरह सार्वजनिक दान से हो, जैसा कि गांधीजी और पटेल चाहते थे।
स्वतंत्र भारत और पुनर्निर्माण का संकल्प
1947 में आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर भारत के नवजागरण का प्रतीक बना। देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न बनाया। उनके संकल्प से मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण प्रारंभ हुआ। 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “सोमनाथ का पुनर्निर्माण भारत की पराजय नहीं, बल्कि उसके पुनर्जन्म का उद्घोष है।”
21वीं सदी: आस्था, विरासत और विकास
आज 21वीं सदी में सोमनाथ मंदिर आधुनिक भारत की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। भव्य शिखर, समुद्र के किनारे स्थित दिव्य परिसर, डिजिटल सुविधाएं और लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि सोमनाथ केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि जीवंत वर्तमान है। यह मंदिर आज भी यह संदेश देता है कि सत्ता बदल सकती है, आक्रमण हो सकते हैं, लेकिन भारत की आत्मा और आस्था को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।
प्रख्यात इतिहासकार ओमजी उपाध्याय बताते हैं कि सोमनाथ मंदिर की कहानी ध्वंस और निर्माण की नहीं, बल्कि संघर्ष और संकल्प की कहानी है। मुगल काल की कट्टरता से लेकर 21वीं सदी के आत्मविश्वासी भारत तक, सोमनाथ हर युग में खड़ा होकर यह कहता है
आस्था को तोड़ा जा सकता है, मिटाया नहीं। सोमनाथ आज भी इतिहास के गर्भ से उठती उस आवाज़ का प्रतीक है, जो हर पीढ़ी को आत्मसम्मान, संस्कृति और साहस का पाठ पढ़ाती है।




















