एक दशक पहले तक जो मिट्टी का तेल (Kerosene) भारतीय रसोई और ग्रामीण घरों की रोशनी का आधार हुआ करता था, वह अब फिर से वापसी कर रहा है। केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए राशन की दुकानों (PDS) और पेट्रोल पंपों के जरिए मिट्टी का तेल बेचने की अनुमति दे दी है। ईरान-इजरायल युद्ध के बीच पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट को देखते हुए इसे भारत की ‘प्लान-बी’ रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
दुनिया इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठी है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग) पर खतरे के बादल मंडरा दिए हैं। युद्ध की वजह से कच्चे तेल और एलपीजी (LPG) की सप्लाई चेन प्रभावित हुई है।
भविष्य में गैस की भारी किल्लत न हो, इसलिए सरकार ने केरोसिन को एक ‘बैकअप’ ईंधन के रूप में उतारने का फैसला किया है। तेल कंपनियों के पास केरोसिन का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में इसकी मांग लगभग शून्य हो गई थी।
भारत में मिट्टी के तेल का इतिहास काफी दिलचस्प है। 1952 में ‘स्टैंडर्ड वैक्यूम रिफाइनिंग कंपनी’ के जरिए यह भारत आया। एक दौर था जब इससे सिर्फ चूल्हे नहीं, बल्कि पंखे, प्रेस और गाड़ियां तक चलती थीं। 2014 में पीएम मोदी के आने के बाद ‘उज्ज्वला योजना’ और बेहतर बिजली सप्लाई ने केरोसिन को हाशिए पर धकेल दिया। धुआं और प्रदूषण इसकी विदाई की बड़ी वजह बने।
सरकार ने रास्ता तो खोल दिया है, लेकिन जमीन पर स्थिति बदल चुकी है। आज के दौर में अधिकतर घरों से मिट्टी के तेल वाले स्टोव और लालटेन गायब हो चुके हैं। कबाड़ में जा चुके इन उपकरणों की जगह अब इंडक्शन और गैस चूल्हों ने ले ली है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जनता फिर से पुराने उपकरणों की ओर लौटेगी?
21 राज्यों की राशन दुकानों और चुनिंदा पेट्रोल पंपों पर। पेट्रोल पंपों को फिलहाल अगले 60 दिनों तक बिक्री की अनुमति है। बाजार में इसकी कीमत 60 रुपये प्रति लीटर से अधिक है, हालांकि तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह रियायती दरों पर उपलब्ध है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि इसका उपयोग केवल खाना बनाने और रोशनी के लिए ही किया जा सकेगा। मिट्टी के तेल की यह ‘घर वापसी’ मजबूरी है या मास्टरस्ट्रोक, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि सरकार किसी भी बड़े ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अपने पुराने तरकश से पुराने तीर निकालने को तैयार है।















