मिडिल ईस्ट में बारूद की गंध फैली है, आसमान मिसाइलों से पटा है और ईरान के शहर धमाकों से गूंज रहे हैं। इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमलों ने ईरान की कमर तोड़ दी है। सुप्रीम लीडर खामेनेई के खात्मे के बाद अब चर्चा है ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की। लेकिन, जब बात ईरान के भीतर घुसकर Ground Attack की आती है, तो महाशक्ति अमेरिका के कदम ठिठक जाते हैं। खुद डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं, शायद इसकी जरूरत नहीं।
आखिर क्या वजह है कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेना ईरान की जमीन पर कदम रखने से कतरा रही है? इसका जवाब आज के युद्ध में नहीं, बल्कि 47 साल पुराने उस जख्म में छिपा है, जिसने अमेरिकी गुरूर को ईरान के रेगिस्तान में दफन कर दिया था।
बात 1979 की है, जब ईरान में क्रांति की आग धधक रही थी। अमेरिका के कट्टर दुश्मन अयातुल्ला रुहुल्ला खुमैनी सत्ता में आ चुके थे। तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला हुआ और 52 अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बना लिया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने अपने नागरिकों को छुड़ाने के लिए एक बेहद गुप्त और साहसी मिशन तैयार किया— ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ (Operation Eagle Claw)।
मिशन का घातक प्लान:
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तारीख: अप्रैल 1980
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बल: डेल्टा फोर्स, रेंजर्स और नौसेना के जांबाज।
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लोकेशन: तेहरान से 320 किमी दूर ‘डेजर्ट वन’ नामक रेगिस्तानी इलाका।
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रणनीति: 8 ताकतवर हेलीकॉप्टर और C-130 विमानों को ओमान के रास्ते ईरान के रेगिस्तान में उतरना था।
अमेरिका ने सोचा था कि वे चुपचाप घुसेंगे और बंधकों को निकाल लाएंगे, लेकिन ईरान की मिट्टी को कुछ और ही मंजूर था। ऑपरेशन शुरू होते ही कुदरत अमेरिका के खिलाफ हो गई। अचानक आए भीषण रेतीले तूफान (Haboob) ने अमेरिकी पायलटों की आंखों के सामने अंधेरा कर दिया।
खराब मौसम के कारण कई हेलीकॉप्टर खराब हो गए। मिशन को रद्द करने का फैसला लिया गया। वापसी के दौरान एक अमेरिकी हेलीकॉप्टर और C-130 विमान आपस में टकरा गए। देखते ही देखते ईरान का रेगिस्तान अमेरिकी सैनिकों की लाशों और जलते हुए मलबे से भर गया।
नतीजा ये हुआ कि 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए, एक भी बंधक नहीं छूटा और दुनिया के सामने अमेरिका की भारी किरकिरी हुई। इसी नाकामी ने जिमी कार्टर की राष्ट्रपति कुर्सी छीन ली थी।
आज जब डोनाल्ड ट्रंप यह कहते हैं कि “मुझे नहीं लगता कि ग्राउंड फोर्स की जरूरत होगी”, तो उनके जहन में वही 1980 की तबाही तैर रही होती है। इतिहास गवाह है कि ईरान की भौगोलिक स्थिति और वहां का रेगिस्तान बाहरी सेनाओं के लिए ‘डेथ ट्रैप’ (मौत का जाल) साबित होता रहा है।
मौजूदा स्थिति के 3 कड़वे सच पर गौर करें तो ईरान की जमीन पर घुसने का मतलब है अंतहीन गुरिल्ला युद्ध में फंसना। बमबारी के बावजूद ईरान झुकने को तैयार नहीं है, जो अमेरिका के लिए बेचैनी का सबब है। अमेरिका जानता है कि आसमान से बम गिराना आसान है, लेकिन तेहरान की गलियों में घुसकर जीतना नामुमकिन जैसा है।
47 साल पहले रेगिस्तान में मिली वो हार आज भी वाशिंगटन के गलियारों में गूंजती है। यही वजह है कि ट्रंप और उनकी सेना मिसाइलों से तो खेल रही है, लेकिन ईरान की मिट्टी पर बूट रखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही।

















