भारत को आज़ादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिली हो, लेकिन देश की संघीय राजनीति को संतुलित और मजबूत करने की प्रक्रिया इसके बाद भी जारी रही। इसी राजनीति का एक अहम अध्याय जुड़ा है 21 जनवरी 1972 से, जब आज़ादी के करीब 25 साल बाद भारत को तीन नए पूर्ण राज्य मिले — मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा। ये तीनों राज्य अपने गठन के 54 वर्ष पूरे कर रहे हैं।

PIB के अनुसार, नॉर्थ ईस्टर्न री-ऑर्गेनाइजेशन एक्ट, 1971 के तहत केंद्र सरकार ने 21 जनवरी 1972 को यह ऐतिहासिक निर्णय लिया। यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि पूर्वोत्तर की राजनीतिक आकांक्षाओं को मान्यता देने वाला कदम माना गया। उस दौर में पूर्वोत्तर भारत में अलग पहचान, स्वशासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लगातार मांग उठ रही थी। केंद्र सरकार ने राज्य का दर्जा देकर इन मांगों को संवैधानिक दायरे में संबोधित करने की कोशिश की।
मेघालय असम का हिस्सा था, जहां अलग प्रशासन और पहचान की मांग लंबे समय से चल रही थी। मणिपुर और त्रिपुरा केंद्र शासित प्रदेश थे, जहां सीमित राजनीतिक अधिकार थे। राज्य का दर्जा मिलने से इन क्षेत्रों को अपनी विधानसभा, चुनी हुई सरकार और नीति निर्धारण की शक्ति मिली, जिससे स्थानीय राजनीति को नई दिशा मिली।
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राज्य बनने के बाद से क्षेत्रीय दलों और स्थानीय नेतृत्व को उभरने का मौका मिला। इसके साथ ही केंद्र–राज्य संबंधों में संतुलन बना। वहीं पूर्वोत्तर की आवाज़ राष्ट्रीय राजनीति में और मजबूत हुई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला सुरक्षा, एकीकरण और विकास — तीनों दृष्टि से केंद्र के लिए रणनीतिक था। 54 साल बाद भी मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा की राजनीति राष्ट्रीय विमर्श का अहम हिस्सा बनी हुई है। ये राज्य न सिर्फ पूर्वोत्तर की राजनीतिक धुरी हैं, बल्कि केंद्र सरकार की नीतियों और क्षेत्रीय अस्मिताओं के संतुलन का जीवंत उदाहरण भी हैं। 21 जनवरी सिर्फ तीन राज्यों के गठन की तारीख नहीं, बल्कि यह याद दिलाती है कि कैसे राजनीतिक दूरदर्शिता से भारत के संघीय ढांचे को मजबूत किया गया।


































