31 मार्च 2026 की तारीख भारत के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया है कि भारत अब पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुका है। दशकों तक भय, हिंसा और ‘लाल गलियारे’ (Red Corridor) के खौफ में जीने वाले करोड़ों लोगों के लिए यह आजादी की नई सुबह है। अमित शाह ने स्पष्ट संदेश दिया “जो आत्मसमर्पण करेगा, उसका पुनर्वास होगा और जो हथियार उठाएगा, उसे कानून के तहत सजा मिलेगी।
नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित अबूझमाड़ को अपनी अघोषित राजधानी बना रखा था। 94,000 वर्ग किमी का यह दुर्गम इलाका नक्सलियों का सबसे सुरक्षित गढ़ था। लेकिन सुरक्षाबलों की रणनीति ने वह कर दिखाया जो कभी असंभव लगता था।घने जंगल और कोई ज्योग्राफिक मैपिंग न होना। करीब 400 छोटे-बड़े ऑपरेशन, जिनमें 80 बड़े सर्जिकल स्ट्राइक जैसे हमले थे।सुरक्षाबलों ने जंगल के चप्पे-चप्पे पर 400 से ज्यादा कैंप स्थापित किए।
पिछले तीन सालों में नक्सलियों का विनाश किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। कभी 6000 सशस्त्र लड़ाकों वाली फौज अब महज 60 पर सिमट गई है।
| राज्य | मारे गए / गिरफ्तार / सरेंडर | कुल सफाया |
| छत्तीसगढ़ | 499 (मारे गए), 1920 (अरेस्ट), 2738 (सरेंडर) | 5177 |
| महाराष्ट्र | 110 (मारे गए), 200 (अरेस्ट), 180 (सरेंडर) | 490 |
| आंध्र/तेलंगाना | 35 (मारे गए), 200 (अरेस्ट), 718 (सरेंडर) | 953 |
| झारखंड/ओडिशा | 45 (मारे गए) | 45+ |
नक्सली नेपाल के पशुपति से भारत के तिरुपति तक अपना राज कायम करना चाहते थे। तीन साल पहले तक 1200 किलोमीटर के इस इलाके में उनकी ‘जनताना सरकार’ चलती थी। नक्सलियों के थिंक टैंक और रणनीति के सबसे बड़े सलाहकार सोनू दादा (मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल) समेत 22 सेंट्रल कमेटी मेंबर या तो मारे गए या सरेंडर कर गए। अब सिर्फ झारखंड में एक मुख्य कमांडर मिशीर बेसरा बचा है, जिसकी लोकेशन ट्रेस हो चुकी है।
सरकार ने इस बार दोतरफा हमला किया। एक तरफ आधुनिक हथियार और सटीक इंटेलिजेंस थी, तो दूसरी तरफ ‘विश्वास’ की रणनीति। नक्सल प्रभावित इलाकों में स्कूल, सड़क, मोबाइल टावर और बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाई गईं।
महाराष्ट्र आईजी संदीप पाटिल के अनुसार, “जिन हाथों में नक्सली हथियार थमाना चाहते थे, हमने वहां किताबें थमा दीं। बस्तर आईजी पी सुंदरराज के मुताबिक, अब यह क्षेत्र शांति और प्रगति का वैश्विक मॉडल बनेगा।
2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में रायपुर के साइंस कॉलेज मैदान से जब अमित शाह ने नक्सलवाद खत्म करने का वादा किया था, तो कई लोगों ने इसे ‘चुनावी जुमला’ समझा था। लेकिन गृह मंत्री की संकल्पशक्ति और सुरक्षाबलों के शौर्य ने 31 मार्च 2026 से पहले ही इस लक्ष्य को हासिल कर लिया। डर की जगह अब उम्मीद ने ली है। लाल आतंक का अंत हो चुका है और विकास की नई इबारत लिखी जा रही है।
अब बस्तर और अन्य प्रभावित इलाके शांति और प्रगति के मॉडल बनेंगे। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली अब खेती, पढ़ाई और रोजगार के जरिए मुख्यधारा में लौट रहे हैं। भारत के सीने से ‘लाल आतंक’ का घाव अब पूरी तरह भर चुका है।















