मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर वैश्विक ईंधन बाजार में हलचल पैदा कर दी है। इस तनाव का सीधा असर भारत के घरों और छोटे व्यवसायों पर पड़ रहा है, जहां एलपीजी (LPG) की सप्लाई चेन प्रभावित होने का डर बना हुआ है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस गैस सिलेंडर के बिना आज भारतीय रसोई की कल्पना करना मुश्किल है, उसका सफर भारत में कब और कैसे शुरू हुआ था? आइए, संकट के इस दौर में पलटते हैं इतिहास के पन्ने।
भारत की एलपीजी यात्रा की शुरुआत 22 अक्टूबर 1965 को हुई थी। इंडेन (Indane) ब्रांड के तहत देश का पहला आधिकारिक गैस कनेक्शन जारी किया गया था। इस गौरव का केंद्र बना पश्चिम बंगाल का कोलकाता शहर, जिसे भारत की एलपीजी यात्रा का ‘बर्थप्लेस’ कहा जाता है।
शुरुआती दौर में यह कोई बड़ी योजना नहीं बल्कि एक छोटा सा प्रयोग था। पहले बैच में कोलकाता और पटना के लगभग 2,000 उपभोक्ताओं को शामिल किया गया था। आज करोड़ों की संख्या में मौजूद एलपीजी उपभोक्ताओं की नींव इन्हीं 2,000 परिवारों ने रखी थी।
आज जब गैस सिलेंडर की कीमतें 1,000-1,100 रुपये के आसपास झूल रही हैं, तो यकीन करना मुश्किल है कि 1965 में एक सिलेंडर की कीमत महज 3.50 रुपये से 4 रुपये के बीच थी। पिछले छह दशकों में कीमतों में आई यह भारी उछाल न केवल महंगाई को दर्शाती है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार की जटिलता को भी बताती है।
आज सिलेंडर खत्म होने पर हमें चिंता होती है, लेकिन 1960 के दशक में लोग इसे घर में रखने से डरते थे। शुरुआती सालों में सुरक्षा चिंताओं के कारण कई लोग एलपीजी अपनाने में हिचकिचा रहे थे। रसोई के भीतर गैस सिलेंडर रखना उस समय एक ‘जोखिम भरा विचार’ माना जाता था। लोगों को लकड़ी और कोयले के धुएं से निकालकर क्लीन एनर्जी तक लाना एक बड़ी चुनौती थी।
महज चंद हजार कनेक्शनों से शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया की सबसे बड़ी ईंधन वितरण प्रणालियों में से एक बन चुका है। ‘उज्ज्वला’ जैसी योजनाओं ने इसे देश के सुदूर गांवों तक पहुंचा दिया है।
मिडिल ईस्ट का संकट हमें याद दिलाता है कि हम ऊर्जा के लिए बाहरी देशों पर कितने निर्भर हैं। 1965 से शुरू हुआ ₹4 का यह सफर आज आत्मनिर्भरता और नई ऊर्जा चुनौतियों के बीच खड़ा है।















