साल 1982… उत्तर प्रदेश का बदायूं जिला… बरसात की एक काली रात और एक छोटा-सा गांव। शायद 26-27 जुलाई की अंधेरी रात धनपाल के घर अचानक चीख-पुकार मचती है। आरोप लगा कि गांव के ही सात लोग घर में घुसे, मारपीट की और करीब तीन हजार रुपये नकद और सोने-चांदी के जेवर लेकर फरार हो गए। उस दौर में 3 हजार रुपये किसी परिवार की महीनों की कमाई हुआ करती थी।
मामला पहुंचा उझानी थाने। पुरानी धाराओं के मुताबिक धारा 395 (डकैती) और 397 (जानलेवा हमले के साथ डकैती) के तहत केस दर्ज हुआ। गांव सन्न रह गया—क्योंकि आरोपियों के नाम में कुछ लोग उसी गांव के थे। ट्रायल कोर्ट ने 29 अगस्त 1983 को सातों आरोपियों को दोषी मानते हुए पांच से सात साल के कठोर कारावास की सजा सुना दी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।
समय बीतता गया… गांव बदल गया… सरकारें बदल गईं… लेकिन फाइलें नहीं चलीं।
करीब 43 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह मामला फिर सुर्खियों में आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकलपीठ, न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने अपील पर सुनवाई की। इस बीच सात में से चार आरोपी दुनिया छोड़ चुके थे। अब सिर्फ तीन—अली हसन, हरपाल और लतूरी, जिनकी उम्र 70 साल से ज्यादा हो चुकी थी—इंसाफ का इंतजार कर रहे थे।
हाईकोर्ट ने जब केस की परतें खोलीं तो कई सवाल खड़े हो गए— गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे। एक गवाह ने चाकू से हमला बताया, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में चोट “कठोर और कुंद वस्तु” से बताई गई। पुलिस न तो लूट का माल बरामद कर सकी, न ही घटनास्थल से कोई ठोस सबूत जुटा पाई।
अदालत ने यह भी कहा कि यह संदिग्ध है कि गांव के लोग बिना चेहरा ढके अपने ही पड़ोसियों के घर डकैती डालें। पुरानी रंजिश में फंसाए जाने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सका। इन तमाम कमियों के आधार पर अदालत ने कहा—अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा।
न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने कहा कि गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियां हैं। ऐसे में कानून का सिद्धांत साफ है— जब संदेह हो, तो उसका लाभ आरोपी को मिलता है। अदालत ने अली हसन को धारा 395 से बरी किया। हरपाल और लटूरी को धारा 395 व 397 से बरी किया और 43 साल पुराना फैसला पलट दिया।
क्या यह इंसाफ देर से मिला? या फिर एक अधूरी जांच ने तीन जिंदगियों के 43 साल निगल लिए?
तीन हजार रुपये की डकैती का मामला अब इतिहास बन चुका है, लेकिन यह फैसला न्याय व्यवस्था की उस धीमी रफ्तार की भी याद दिलाता है, जहां एक फाइल पीढ़ियां पार कर जाती है—और फैसला तब आता है, जब उम्र ढल चुकी होती है।
1982 की वो रात अब सिर्फ याद है… और 2026 का फैसला, एक लंबी कानूनी लड़ाई का आखिरी पन्ना।

























