दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में यौन अपराधों (रेप और यौन उत्पीड़न) के मामलों में पीड़ित मुआवजा योजना के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने 15 दिसंबर 2025 के एक फैसले में
किया कि कई मामलों में पीड़िता को FIR दर्ज होने के बाद अंतरिम मुआवजा मिल जाता है, लेकिन बाद में वह आरोपों से मुकर जाती है, समझौता कर लेती है या गवाही में होस्टाइल हो जाती है। ऐसे में दिया गया मुआवजा अक्सर वापस नहीं लिया जाता, जो सार्वजनिक धन का दुरुपयोग है और असली पीड़ितों की मदद करने वाली योजना की विश्वसनीयता को कम करता है।
कोर्ट ने कहा कि अगर झूठे या वापस लिए गए आरोपों के मामलों में मुआवजा बिना वसूली के रह जाता है, तो यह न केवल फंड्स का गलत इस्तेमाल है, बल्कि वास्तविक यौन हिंसा पीड़ितों के लिए योजना की स्थिरता को भी प्रभावित करता है। इससे समाज में झूठे आरोपों की प्रवृत्ति बढ़ती है, जो असली पीड़ितों की आवाज को कमजोर करती है।कोर्ट ने जारी की नई गाइडलाइंस
मुआवजा प्रक्रिया को मजबूत बनाने के लिए कोर्ट ने निर्देश दिए:
- ट्रायल कोर्ट को ऐसे मामलों में DSLSA (दिल्ली स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी) को सूचना भेजनी होगी जहां FIR समझौते पर रद्द हो, पीड़िता होस्टाइल हो या आरोपी बरी हो।
- DSLSA को मुआवजा वसूली की जांच करनी होगी।
- हाई कोर्ट में FIR रद्द करने की याचिकाओं में मुआवजा लेने की डिटेल्स अनिवार्य बतानी होंगी।
- दिल्ली विक्टिम कंपेंसेशन स्कीम 2018 के क्लॉज 13 के तहत पहले से वसूली का प्रावधान है, लेकिन अब इसे सख्ती से लागू करने के निर्देश।
यह फैसला एक केस में आया जहां पीड़िता ने तीन आरोपियों पर यौन हमले का आरोप लगाया, मुआवजा लिया, लेकिन बाद में आरोप वापस ले लिए। कोर्ट ने आरोपी को डिस्चार्ज तो किया, लेकिन मुआवजे की वसूली पर जोर दिया।










