कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पड़ोसी या कोई अजनबी व्यक्ति वैवाहिक क्रूरता के मामले में IPC की धारा 498A (पति या उसके रिश्तेदार द्वारा पत्नी के साथ क्रूरता) के तहत आरोपी नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह धारा केवल पति या उसके रक्त संबंधी या विवाह संबंधी रिश्तेदारों पर लागू होती है। पड़ोसी को इसमें घसीटना कानून का दुरुपयोग और न्याय की विफलता होगी।
यह फैसला जस्टिस एम नागप्रसन्ना की सिंगल बेंच ने 6 जनवरी 2026 को दिया। मामले में एक महिला आशा जी (37 वर्षीय) ने याचिका दायर की थी, जो एक दंपति की पड़ोसी थी। पत्नी ने अपने पति, सास-ससुर और पड़ोसी आशा पर दहेज उत्पीड़न, क्रूरता, धमकी और मारपीट का आरोप लगाकर महालक्ष्मी लेआउट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने धारा 498A, 504, 506, 323 और 34 के तहत केस दर्ज किया और चार्जशीट दाखिल की। कोर्ट ने याचिका की सुनवाई में कहा कि शिकायत और चार्जशीट की जांच से साफ है कि आशा केवल पड़ोसी है, पति से खून या विवाह का कोई रिश्ता नहीं। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले रमेश कन्नोजिया बनाम उत्तराखंड राज्य का हवाला देते हुए जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा, “धारा 498A के तहत ‘रिश्तेदार’ का मतलब केवल ब्लड रिलेशन या मैरिज रिलेशन से है। पड़ोसी या अजनबी को इसमें नहीं घसीटा जा सकता।” कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में बाहरी लोगों को शामिल करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और न्याय की हानि करता है।
इस फैसले से आशा के खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई। कोर्ट ने पति और परिवार के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन पड़ोसी को पूरी तरह राहत दे दी।यह फैसला धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने में महत्वपूर्ण है, जहां अक्सर वैवाहिक विवादों में बाहरी लोगों को फंसाया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे कानून के सही इस्तेमाल पर जोर मिलेगा और निर्दोषों को अनावश्यक परेशानी से बचाएगा।








