अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने फिर से ग्रीनलैंड पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। 2025 में सत्ता में वापसी के बाद से ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि अमेरिका को इस विशाल आर्कटिक द्वीप को खरीदना या नियंत्रित करना चाहिए। उनका तर्क है कि ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा, दुर्लभ खनिजों (rare earth minerals) और आर्कटिक में बढ़ते रूस-चीन प्रभाव के खिलाफ महत्वपूर्ण है। ट्रंप ने कहा है, “हम ग्रीनलैंड के साथ कुछ करेंगे, अच्छे तरीके से या मुश्किल तरीके से।” यहां तक कि उन्होंने सैन्य विकल्प को भी नकारा नहीं है, जिससे NATO सहयोगी देशों में हड़कंप मच गया है।
ग्रीनलैंड डेनमार्क का सेमी-ऑटोनॉमस क्षेत्र है, दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप, जहां ज्यादातर बर्फ से ढका हुआ है। यहां की आबादी सिर्फ 56,000 के आसपास है, लेकिन इसके नीचे दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के विशाल भंडार हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक्स, रिन्यूएबल एनर्जी और मिलिट्री टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी हैं। अमेरिका के पास पहले से ही ग्रीनलैंड में Pituffik Space Base है, लेकिन ट्रंप पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं। 2019 में भी उन्होंने ऐसा ही प्रस्ताव रखा था, जिसे डेनमार्क ने “absurd” कहकर ठुकरा दिया था। अब 2026 में यह मुद्दा और गंभीर हो गया है। अनुमान है कि ग्रीनलैंड खरीदने की कीमत 500-700 बिलियन डॉलर तक हो सकती है।
ट्रंप के इस रुख से NATO में उनके सहयोगी देश विरोध में खड़े हो गए हैं। डेनमार्क ने साफ कहा है कि ग्रीनलैंड बिकने के लिए नहीं है, और सैन्य कार्रवाई NATO को खत्म कर देगी क्योंकि Article 5 के तहत हमले पर सामूहिक रक्षा होती है। डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी मिलिट्री बढ़ाई है, और फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड जैसे NATO देशों ने वहां ट्रेनिंग और टुकड़ियां भेजी हैं। यह एकजुटता दिखाने का तरीका है। कई यूरोपीय नेता कह रहे हैं कि अमेरिका का एक NATO सहयोगी के क्षेत्र पर दावा गठबंधन को “incinerate” (जला) सकता है। सीनेटर मिच मैककोनेल जैसे रिपब्लिकन भी इसे “strategic self-harm” बता रहे हैं। ग्रीनलैंड के
लोग भी 85% से ज्यादा विरोध कर रहे हैं।ट्रंप का यह कदम आर्कटिक में अमेरिकी वर्चस्व बढ़ाने का हिस्सा लगता है, लेकिन इससे NATO में दरार पड़ रही है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ बातचीत हो रही है, लेकिन “fundamental disagreement” बरकरार है। ट्रंप ने विरोध करने वाले देशों पर टैरिफ बढ़ाने की भी धमकी दी है। यह स्थिति वैश्विक भू-राजनीति के लिए चुनौतीपूर्ण है।



















